वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
गुरु पूर्णिमा :– गुरु शिष्य परंपरा के साक्षात अवतार हैं स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज

सृष्टि की अनमोल धरोहर ब्रम्हविद्या यथार्थ गीता के प्रणेता अलमस्त परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के आश्रम मोक्षदायिनी ज्ञान गंगा केंद्र श्री परमहंस आश्रम शक्तिषगढ़ में 29 जुलाई को गुरू पूर्णिमा भव्य नव्य तरीके से मनाया जाएगा। इस पावन पर्व पर देश-विदेश में स्थित उनके सत्यान्वेषी शिष्यगण, भक्तगण उनका चरण- वंदन , पूजन -अर्चन, आरती अभिनंदन एवं वंदन करेंगे। 15 से 20 लाख श्रद्धालुओं का आगमन 29 जुलाई को विगत कई वर्षों की ही तरह होगा। उनकी सेवा देखरेख में आश्रमीय सेवाश्रम भक्तजन व प्रशासन चाक-चौबंद रहेगा। गुरु पूर्णिमा हमारे अनादिकालीन गौरवशाली इतिहास का एक आदर्श परंपरा का पर्व है । सद्गुरु सृष्टि का सर्वोच्च, महानतम व आलौकिक स्थिति है । सद्गुरु कालजयी,
कालबलि से मुक्त व कायनात का मालिक होता है। प्रकृति सद्गुरु के हाथ का खिलौना होती है और सृष्टि उसके अंगुलियों पर नाचती है। सद्गुरु को योगेश्वर, महापुरुष ,भगवान , परमात्मा आदि विभूतियों से विभूषित किया गया है। सद्गुरु सूर्य को पश्चिम में उगाकर पूर्व में डुबा सकता है उसमें पूरी पृथ्वी को उथल-पुथल करने की अपार शक्ति होती है। इसीलिए उसे सृष्टि का रचयिता विनाशक व पालनहार कहा जाता है। प्रकृति के अनंत खोह-खंद से निकाल कर अपने शिष्यों के जन्म जन्मांतर के अनंत संस्कारों को भष्मसात कर अपने ही समान पूर्णत्व प्रदान कराने वाले तारणहार का नाम ही सद्गुरु है। ऐसे पावन सद्गुरु की पूजा-अर्चना का नाम ही गुरु पूर्णिमा है। इस पावन पर्व पर मायातीत होने को आतुर आत्मकल्याण की कामना में भक्तजन अपने खेवनहार सद्गुरु को दर्शन कर कृत-कृत , धन्य -धन्य हो जाते हैं।
आध्यात्म के प्ले क्लास से लेकर शोधछात्र तक के भक्तजन अपने योगेश्वर गुरु भगवान की एक झलक दर्शन कर कृतार्थ हो जाते है। गुरु- शिष्य पऱंपरा का पर्वों का महान पर्व गुरु पूर्णिमा भारतीय सांस्कृतिक पराकाष्ठा का परिणाम है। जिसे विश्व बड़े ही कौतूहल ढंग से देखता है। क्रूर विदेशी आक्रांताओं की क्रूरता आध्यात्मिक इस विरासत विधा को नहीं मिटा सके। तुलसी कबीर रैदास दादू गुरु नानक स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के गुरु स्वामी परमानंद जी महाराज आदि जैसे अनेकानेक महापुरुषों के माध्यम से भारतीय मनीषियों की आध्यात्मिक थाती अक्षुण्ण रही। यहां तक कि ब्रिटिश हुकूमत के अधीन भारत शिकागो धर्म परिषद के माध्यम से सद्गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद ने ईसाइयत व अन्य धर्मावलंबियों को मात देकर अंग्रेजी हुकूमत के दंभी अभिमान को चकनाचूर कर दिया था ; कि हम इसाई सर्वश्रेष्ठ हैं इस दंभ को शिष्य स्वामी विवेकानंद ने ब्रम्हविद्या के बल व सद्गुरु की कृपा से ईसाइयत को घुटने टेकने पर मजबूर कर विश्व गुरु भारत की नींव को मजबूत किया था। सृष्टि में गुरु -शिष्य पऱंपरा का अनुपम इतिहास का प्राचीनतम महात्म्य है, और अद्भुत आलौकिक वेशकीमती जोड़ी है। सद्गुरु सप्तर्षि व शिष्य वाल्मीकि की जोड़ी, सद्गुरु विश्वामित्र- शिष्य राम, सद्गुरु वाल्मीकि- शिष्य लवकुश , सद्गुरु श्रीकृष्ण -शिष्य अर्जुन, सद्गुरु रामाऩद शिष्य -कबीर, सद्गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस- शिष्य स्वामी विवेकानंद, सद्गुरु स्वामी परमानंद शिष्य -परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज आदि जैसे गुरु- शिष्य पऱंपरा की पावन परंपरा अबाध गति से अनादिकाल से चली आ रही है। आज के 5200 सौ वर्ष चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में हरियाणा राज्य के कुरुक्षेत्र में जो उपदेश युद्ध से विचलित शिष्य अर्जुन को सद्गुरु श्री कृष्ण ने दिया था और उससे पहले सृष्टि के अनादिकाल में सूर्य ने महाराज मनु को दिया था उसी विस्मृत ब्रम्हविद्या को 21 सदी में स्वामी श्री
अड़गड़ानंद जी महाराज ने संसार के समक्ष यथार्थ गीता के रूप में गुरु- शिष्य संवाद की अमर कीर्ति कथा की अमरता प्रदान किये हैं। यथार्थ गीता गुरु शिष्य संवाद की अनुपम ईश्वरीय वाणी है जिसकी अक्षुण्णता चिरस्थायी है। गुरु- शिष्य संवाद की यह अनमोल धरोहर विश्व मनीषा के लिए अनुकरणीय है। संचार -क्रांति के इस युग में विश्वमय पहचान पा चुकी यथार्थ गीता गुरु- शिष्य पऱंपरा की गौरवगाथा व ऋषि-मुनियों संत-महात्माओं के हजारों वर्षों की तपस्या का परिणाम है। उन्हीं ऋषि-मुनियों संत-महात्माओं की तपस्या का परिणाम है यथार्थ गीता जो विशुद्ध ब्रम्हविद्या है। ब्रम्हविद्या की पढ़ाई किसी ईंट पत्थर से निर्मित महाविद्यालयों विश्वविद्यालयों में नहीं होती इसकी पढ़ाई आनलाईन/आफलाइन नहीं होती, इसकी पढ़ाई किसी कोचिंग सेंटर में नही होती । इसकी पढ़ाई के लिए अत्याधुनिक तकनीक की जरुरत नहीं पड़ती। इसकी पढ़ाई के लिए पार्थिव शिक्षा की जरूरत भी नहीं पड़ती। इसकी पढ़ाई सद्गुरुओं के घरानों में होती है सद्गुरु का चरण और उनकी कृपा ही ब्रम्हविद्या की पढ़ाई का पाठशाला है। इस पढ़ाई की परीक्षा तलवार की धार पर चलती है। परीक्षा पास होने का एक ही उपाय है कि हृदय से रथी सद्गुरु के आदेश पर यंत्रवत चलना । यही है तलवार की धार। शिष्य को फेल करने माया और पास करने में सद्गुरु का अहम रोल होता है । इस परीक्षा में जो पास हुआ वह सद्गुरु ही बनता है। वाल्मीकि जो राम नहीं कह पाते थे जब उन्होंने सद्गुरु की परीक्षा पास की तो उन्होंने लिखा संस्कृत में रामायण। जिसका चार श्लोक रट लेने वाला आज अपने आप को वेदांती प्रकांड पंडित बोलता है। “*मसि कागज छूयो नहिं कलम गह्यो नहिं हाथ”* काया के बीर कबीर ने ऐसी वाणी बोले कि उन पर आज भी विश्वविद्यालयों में शोध छात्र रिसर्च कर रहे हैं। दादा गुरु परमहंस स्वामी श्री परमानंद जी के शिष्य स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की पार्थिव शिक्षा कक्षा तीन तक रही। लेकिन जब सद्गुरु की पाठशाला में टाप करके यथार्थ गीता लिखे जिसको पढ़ने के बाद विश्व के प्रकांड विद्वान प्रोफेसर की बुद्धि बाउंस कर जाती है। आज वे ईश्वरीय आध्यात्मिक विश्वविद्यालय के ऐसे टापर हैं कि ईश्वर ने उन्हें परिणाम में विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित किये हैं उन्हें सद्गुरु महापुरुष योगेश्वर भगवन अनादि विभूतियों से विभूषित किये हैं। आज स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज सद्गुरु के रूप में विश्व के सर्वोत्तम टीचर हैं। उनके द्वारा लिखी यथार्थ गीता की हर एक लाइन, हर एक शब्द, हर एक अक्षर, हर एक वाक्य ईश्वरीय वाणी है। पार्थिव शिक्षा व पार्थिव बुद्धि की इसमें लेशमात्र भी जगह नहीं है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के माध्यम से यथार्थ गीता के रुप में भगवान बोले हैं। गुरु- शिष्य पाठशाला में पढ़ाई के तौर पर शिष्य के जन्म-जन्मांतर के संस्कार को योगाग्नि में सद्गुरु के द्वारा
भष्मसात करने के बाद शिष्य की अवस्था संकल्प- विकल्प से शून्य आकाशवत हो जाती है । शिष्य का हृदय निर्मल -निर्लेप होते ही भगवान उस शिष्य के ह्रदय को धारण कर लेते हैं फिर उस शिष्य की शिष्यता सद्गुरु के रूप में परिणत हो जाती है। फिर उनकी वाणी , उनका हृदय, उनकी रहनी, ईश्वरीय आभा से युक्त हो संसार के कल्याणार्थ उपयुक्त हो जाती है । फिर वे जो भी बोलते हैं वो ईश्वर बोलते हैं उनका अपना विचार नहीं बल्कि ईश्वरीय विचार वाणी होता है। गुरु के इसी गुरुता को प्राप्त करने के लिए गुरु पूर्णिमा के दिन दूर -दराज से शिष्य गण गुरु भगवान की पूजा हेतु उन्हें रिझाने हेतु उनके शिष्य गण उनकी पूजा-अनुष्ठान करते हैं। ब्रम्ह बेला में ही स्नान ध्यान के बाद वे पूज्य श्री गुरुदेव भगवान का पूजा-अनुष्ठान करते हैं, उनकी आरती करते हैं । पूज्य श्री गुरुदेव भगवान साधना के पराकाष्ठा को प्राप्त करने के उपाय और अपनी दिव्य दृष्टिपात से उनमें आलौकिक दिव्य शक्ति का संचार करते हैं जिससे वे फिर साल भर संचार दिव्य शक्ति की मर्यादा में भजन चिंतन कर सके । अपनी आध्यात्मिक आशीर्वाद से उन्हें ईश्वरीय कवच से युक्त कर देते हैं जिससे माया के तरह-तरह के वार से बचकर वे सद्गुरु के चरणों में लीन रहें। संसार के खेवनहार ऐसे महापुरुष की चरणों में कोटि- कोटि नमन। ओम् श्री सद्गुरु देव भगवान की जय।






