National media news ( nm news)

सम्पादक देवेन्द्र राय

September 21, 2026 2:09 am

National media news ( nm news)

सम्पादक देवेन्द्र राय

Follow Us

September 21, 2026 2:09 am

अविद्या रूपी होलिका दहन की अध्यात्मिक व्याख्या करते स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

संपादकीय द्वारा अम्बेडकर नगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”

 

अविद्या रूपी होलिका दहन की अध्यात्मिक व्याख्या करते स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

 

कालजयी समय के महापुरुष विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने आज होलिका दहन की अध्यात्मिक व्याख्या की। उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि होली पर्व संसार के लिए एक सीख है नजीर है अध्यात्मिक दहलीज की एक झांकी है ओम् उद्घोष परमतत्व का बीजारोपण है। महापर्व / त्यौहार किसी भी देश की संस्कृति का दर्शन होता है वहां के मानवीय व धार्मिकता का दर्पण होता है ऐसे में होली पर्व जो विश्व गुरु भारत का नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है , जो गुरु शिष्य परंपरा के पवित्रतम बंधन को सुवासित करता है , सद्गुरु नारद और शिष्य प्रहलाद के माध्यम से संसार और मानवता के समक्ष असत्य पर सत्य की विजय, अविद्या पर विद्या की विजय, विजातीय प्रवृतियों पर सजातीय प्रवृतियों की विजय का शंखनाद करती है ।
*राम नाम नर केसरी कनककसिपु कलिकाल।*
*जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दल सुरसाल।।*
नरसिंह क्या है ? सद्गुरु का नाम ही नरसिंह है जो भगवान, परमात्मा, महापुरुष का पर्यायवाची है
*ओमित्येकाक्षरं ब्रम्हा व्याहरन्मामनुस्मरन्।*
*य: प्रयाति त्यजन्देहं से याति परमां गतिम।।*
कथानक के अनुसार जय और विजय जो क्रमशः नाम और रुप के द्योतक है श्रापित हो गये पदच्युत हो गये श्रेय से गिर गये *बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि।*
*जय पाइय सो हरि भगति कहे खगेश विचारि।।*
जो नाम में थे प्रकृति के अनुकूल हो गये मन बुद्धि चित्त और अहंकार चतुष्ट में विकार आ गया जय और विजय च्युत होकर हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप हो गये। हिरण्याक्ष हिरण्य गर्भा प्रकृति को , जो दृष्टि भगवान में विद्या में सजातीय प्रवृतियों में रहनी चाहिए वह दृष्टि संसारोन्मुख हो जाती है इसीलिए भगवान तक नहीं पहुंच पाते यही है श्रेय से गिर जाना ।
*भरत बिबेक बराह बिसाला। अनायास उघरी तेहि काला।।*
ब्रम्ह के राह में चलना ही वराह है वराह कहते हैं ब्रम्ह के राह में चलना संसार से भगवान की ओर चलते हैं यही है संसारोन्मुख प्रकृति को समुद्र में डुबाना जब चलते हैं तपस्या करने तो काया की धुरी को धारण करना ही कयाधू है। जब हम भगवान के काया माने कश्यप जो स्वरूप की ओर धुरी को धारण करते हैं तो उसके अंदर में भगवान के प्रति जो प्रेम की भावना है तभी तो भगवान का सुमिरन चिंतन करेगा यही है प्रहलाद प्रेम ही प्रहलाद है। इंद्रियों के दैवी संपदा पर जब मन का आधिपत्य हो जाता है तो वही है इंद्र और जब साधना भजन की अवस्था आ जाती है तो नाद रन्ध्र तब नाभी धुन की आवाज पकड़ में आती है उनकी आवाज कभी नष्ट नहीं होती है ऐसे सद्गुरु होते हैं उनके द्वारा निर्देशित होते हैं तो *गृह कारज नाना जंजाला ते अति दुर्गम शैल विशाला*
पहाड़ है कामना ही हाथी है संशय से युक्त अंतःकरण शर्पों से भरी पोटली है और अविद्या रूपी होली है असत्य को सत्य मान लेना यह है अविद्या, तो अविद्या रूपी होली भी जल जाती है
*होली अविद्या फूंकि के हो गए गुप्तानंद।*
*समझे कोई सुघड़ विवेकी क्या समझे मतिमंद।।*
और श्वास ही स्तंभ है दोनों तरफ से खत्म दैवीय संपदा और आसुरी संपदा खत्म हो गई अंतःकरण में विचार अच्छे बुरे दोनों होते हैं एक बाहर के होते हैं दोनों से रहित स्तंभ कहते हैं एक श्वास को । श्वास खंभे की तरह स्थायित्व ले लेता है श्वास संकल्प विकल्प से शून्य हो जाता है न भला उद्ववेग उठता है न बुरा। चित्त ही चींटी है उस समय चित् इतनी संयमित हो गई जैसे जीते हुए योगी का चित्त। जीते हुए चित्त को ही चींटी कहते हैं श्वास में प्रहलाद का मन एकाग्रचित्त हो गया अब यही है हिरण्यकश्यप का मारा जाना प्रहलाद की जै जै कार हो गई प्रेम ही प्रहलाद है पर अर्थात परमात्मा के लिए आह्लादित होना पृथ्वी से परे । भवति भव माने प्रकृति इति माने खत्म तो हमारी आपकी जो प्रकृति होती है षडविकारों में काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर परिवार आदि में तो इनसे हट कर जब हम आप भजन साधना करते हैं तो प्रकृति को छोड़ना पड़ता है पहले धीरे धीरे अभ्यास करते करते भजन की ओर मन लगने लगे अब जो महापुरुष हो जाते हैं भगवान माने संचालन कर्ता हो जाता है भग माने प्रकृति इति माने खतम तब हमारी प्रकृति साधना करते करते खत्म हो जाती है क्योंकि प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि है वहीं प्रकृति जैसे वाल्मीकि हुए *वाल्मीकि हुए ब्रम्ह समाना* वाल्मीकि की प्रकृति क्रुर थी रत्नाकर बदलाव हो गया धीरे-धीरे प्रकृति चेंज होकर लक्ष्य की ओर उन्मुख हो गई रत्नाकर से वाल्मीकि हो गये वैसे ही महापुरुष की जो प्रकृति होती है स्वरुपस्थ महापुरुष आत्मरत आत्मतृप्ति आत्मसंतुष्टि जो महापुरुष होते हैं वे अपने स्वरूप में बरतते हैं उनके अंदर विवेक वैराग्य धारण ध्यान समाधि हमेशा ईष्टोमुख ही उनकी वृत्ति रहेगी व्यवहार करें जो कुछ भी करें महापुरुष वाली योग्यता सजा सजाया विद्यमान रहती है । होली पर्व धर्म प्राण भारत में बसन्त ऋतु में मनाई जाती है लोग होलिका दहन करते हैं फाल्गुन में नव वर्ष की शुरुआत होती है
*बसन्त ऋतु फाल्गुन में आवे,*
*खेल यह प्रारब्ध रचवावे*।
*इत्र गुलाल ज्ञान रोरी*,
*खेलते भर – भर के झोरी।।* पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि
फाल्गुन अर्थात विशेष फलदायक गुण, वसन्त ऋतु अर्थात स्थायी मस्ती। सांसारिक ऋतुएं तो आती जाती रहती है, परन्तु जब हृदय देश में भगवान की मस्ती छा जाती है, तो परिवर्तन नहीं होता अर्थात सदैव कायम रहता है। यह स्थिति फलप्रद गुणों से ही आती है, परन्तु उस क्रिया में प्रवृत्त होने में प्रारब्ध भी सहायक है इस साधन में प्रारब्ध का विशेष स्थान है।
इत्र जगत का एक सुगंधित द्रव्य है। वह इस रहनी में एक प्रतीक मात्र है। जब ईश्वरोपलब्धि में यह संपूर्ण खेल सुलभ हो जाता है तब योगी की इन्हीं इंद्रियों में परमात्मा की सुगन्धि का संचार हो जाता है। गुलाल रोरी इत्यादि जो सर्वत्र लगाये जाने वाले पदार्थ है योग की इस रहनी में ये सब ज्ञान संचार के प्रतीक हैं जो इस स्थिति के पुरूषों से प्रायः सदैव सबको मिला है। यह स्थिति हृदय में आती है, इसलिए हृदय रुपी झोली में वह रहनी और ज्ञान भरपूर रहता है। जैसा कि –
*ऊंं पूर्णमिद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।*
*पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।*
अर्थात पूर्ण में से पूर्ण निकाल देने पर शेष पूर्ण ही बचा रहता है, वह घटता नहीं।
*होली अविद्या फूंकि के, हो गये गुप्तानंद।*
*समझे कोई सुघड़ विवेकी, क्या समझे मतिमंद।।*
अविद्या रूपी होली को फूंक कर स्वयं आनंद का स्वरुप बन जाते हैं। जो गुप्त है, आनंद है, अलख है उसी के स्वरुप में लीन हो जाते हैं। इसको कोई सुलझा हुआ विवेकी ही समझ पाता है, बुद्धिहीन नहीं।
*जगत की धूल उड़ी खासी।*
*लावनी सुन बारहमासी।।*
जगत अर्थात जीवगति की धूल पूर्णतया उड़ गई। जीवगति की नश्वरता विलीन हो गयी और परम चेतन की गति बन गई। परम चेतन से अभिन्न, स्थिति दिलाने वाली जो लगन है उसकी प्रक्रिया को सुनो, जिसमें पूर्ति पर्यंत लगे रहने का विधान है उसके बाद नहीं लगना पड़ता है। उसके बाद तो –
*हरिजन भजन भेद से न्यारा।*
*आंख न मूंदे, कान न रूधे काया कष्ट न धारे*
*उघरे नैना साहब देखे, सुंदर बदन निहारे।।*

NM News live
Author: NM News live

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Read More

24 घंटे में घर चोरी का खुलासा, चार लाख के आभूषण व तीन स्मार्टफोन बरामद नशे की लत पूरी करने के लिए चोरी करने वाला आरोपी गिरफ्तार, पुलिस ने शत-प्रतिशत माल बरामद किया सहसपुर। कोतवाली सहसपुर पुलिस ने घर में हुई चोरी की घटना का 24 घंटे के भीतर खुलासा करते हुए एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से करीब चार लाख रुपये कीमत के सोने-चांदी के आभूषण और तीन स्मार्टफोन बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार, महमूदनगर रामपुर निवासी आकाश कुमार ने 17 सितंबर को कोतवाली सहसपुर में तहरीर देकर बताया था कि अज्ञात व्यक्ति ने रात के समय उसके घर से सोने-चांदी के आभूषण और स्मार्टफोन चोरी कर लिए। तहरीर के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। घटना की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर पुलिस अधीक्षक देहात और क्षेत्राधिकारी सहसपुर के पर्यवेक्षण में पुलिस टीम गठित की गई। टीम ने घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तथा संदिग्ध की तलाश के लिए मुखबिर तंत्र सक्रिय किया। 18 सितंबर को मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने घटना में शामिल आशिक पुत्र सलीम, निवासी महमूद नगर शंकरपुर, थाना सहसपुर, उम्र 27 वर्ष को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उसके कब्जे से चोरी किए गए आभूषण और तीन स्मार्टफोन बरामद किए। बरामदगी के आधार पर मुकदमे में संबंधित धाराओं की बढ़ोतरी की गई। पूछताछ में आरोपी ने पुलिस को बताया कि वह नशे का आदी है और नशे की पूर्ति के लिए उसने चोरी की घटना को अंजाम दिया। पुलिस ने आरोपी को न्यायालय के समक्ष पेश किया। बरामद सामान: एक पीली धातु का मंगलसूत्र, एक जोड़ी पीली धातु के कानों के टॉप्स, चार जोड़ी सफेद धातु के बिछुए और तीन स्मार्टफोन। आरोपी का आपराधिक इतिहास: पुलिस के अनुसार आरोपी के विरुद्ध वर्ष 2022 से 2026 तक चोरी, आर्म्स एक्ट सहित विभिन्न धाराओं में पांच मुकदमे दर्ज हैं। पुलिस टीम में उपनिरीक्षक जावेद हसन, कांस्टेबल नवबहार और कांस्टेबल अनुराग शामिल रहे।