वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
साधना के क्रमोन्नत सोपान चार श्रेणियों की सर्वोत्तम व्याख्या स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
“ब्राम्हणोअ्स्य मुखमासीद बाहू राजन्य: कृत: ।उरु तदस्य यद् वैश्य: पदभ्यां शूद्रोअ्जायत।।”

तुम जो सोच रहे हो कि तुम जन्मजात सर्वश्रेष्ठ हो और तुम जो सोच रहे हो कि तुम जन्मजात निम्न कोटि के हो, तो तुम दोनों का सोचना सर्वथा गलत और भ्रामक है। जबकि जन्म से मैं सर्वश्रेष्ठ और जन्म से तुम्हारी निम्न कोटि, तुम दोनों जड़ जीव हो। यदि ऐसा न होता तो महर्षि वेदव्यास, महर्षि वाल्मीकि, माता शबरी, काया के बीर कबीर आदि ब्रम्हर्षि महापुरुषों की दुनिया अनुसरण नहीं करती । इस धरा धाम में वृहद भारतीय उपमहाद्वीप, आनादिकालीन ऋषि-मुनियों की एक परमात्मा की शोध स्थली रहा है ऐसे ही महापुरुषों की शोध से भारत को वैश्विक प्रसिद्धि मिली है। भारत ने ही एक परमात्मा की शोध, आत्मबोध, षडविकारों पर विजय, मन पर विजय के उपायों इत्यादि सत्यान्वेशी युक्तियां सृजित कर मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर दुनिया का एकीकरण किया। “ब्रम्हा जानाति ब्राम्हणा” का प्रतिपादन किया। तुम कैसे सोच लिये कि तुम जन्म से शूद्र, जन्म से वैश्य, जन्म से क्षत्रिय और जन्म से ब्राह्मण हो? तुम कैसे सोच लिये कि तुम्हारा जन्म ब्रम्हा के मुख से , तुम्हारा बाहु से, तुम्हारा जांघ से और तुम्हारा चरण से हुआ है? पूरी दुनिया बायोलाजिकल पैदा होती रही, पैदा हो रही है और भविष्य में भी पैदा होगी। कुछेक तथाकथित तत्समय के धर्माधिकारियों पाखंडियों कर्मकांडियों द्वारा धर्म को अपनी रोजी-रोटी का साधन पीढ़ी दर पीढ़ी बनाने के दृष्टिगत सर्वश्रेष्ठता/ निम्नता पर तमाम समाज को बांटने वाली स्मृतियों की रचना कर डाली गयी और तुमको छला गया। जन्मजात भेदभाव की भावना घर-घर प्रचलित की गई , धरातल पर तत्समय की स्मृतियों को लागू की गयी । भारतीय समाज को जन्म- आधारित, जातिगत बांटकर भारत को अंदर से खोखला कर दिया गया। विदेशी आक्रांताओं ने इसका बखूबी फायदा उठाया फलत: भारत हजार वर्ष तक इन्हीं स्मृतियों के कारण गुलामी दंश से जूझते हुए 15 अगस्त 1947 को मुक्त हुआ। हमारे ऋषि-मुनियों की सोच, शोध, सृजन सार्वभौम सर्वग्राह्य वैश्विक और मानवता के कल्याणप्रद है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि ऋग्वेद संहिता मंडल 10 सूक्त 90 , ऋचा 12 के 
ब्राम्हणोअ्स्य मुखमासीद बाहू राजन्य: कृत: ।
उरु तदस्य यद् वैश्य: पदभ्यां शूद्रोअ्जायत।। श्लोक आध्यात्म परक है न कि संसार परक। उन्होंने इस श्लोक की शास्वत व्याख्या की जैसा कि इसका शाब्दिक अर्थ है सृष्टि के मूल उस परम ब्रम्ह के पद में शूद्र है, जांघ में वैश्य है, बाहु में क्षत्रिय हैं और उस परमात्मा के मुख सहस्र ब्राम्हण है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि भला जो सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है पूरा संसार उसमें सन्निहित है तो उसके हाथ पैर कहां? *बिनु पद चले सुने सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ विधि नाना।। आनन सहित सकल रस भोगी ।बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।*
अर्थात वह परम पुरुष परमात्मा बिना पैर के चलता है जब पैर ही नहीं है तो कैसे उस परमात्मा के पैर से शूद्र ने जन्म ले लिया? *”बिनु बानी बकता बड़ जोगी”* वह परमात्मा बिना मुख के बोलता है जब मुख ही नहीं है तो कैसे ब्राम्हण मुख से पैदा हो गया? लेकिन जो यह ऋचा है उसे महर्षि वेदव्यास ने लिपिबद्ध किया है महर्षि वेदव्यास कोई टीकाकार नहीं थे बल्कि एक महापुरुष थे। तो महापुरुष का आशय एक महापुरुष ही जानता है। जो उन्होंने कहा है वह अक्षरशः सत्य है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि वास्तव में वैदिक ऋचा का वही आशय है जो गीता में है । वास्तव में भजन के आरंभिक अवस्था में सभी शूद्र हैं । परमात्मा के चरण स्थल पर हैं । सद्गुरु के चरणों की सेवा करते- करते भजन पथ में अपने पांवों में खड़े होने की क्षमता आ जाती है तो हम आप वैश्य हो जाते हैं, मानों शिशु जांघो पर खड़ा होने लगा उस समय हम आत्मिक संपत्ति को अर्जित करने की ओर अग्रसर हो जाते हैं। क्षत्रिय – क्षय कहते हैं काटने को, त्रि माने तीनों गुण सत रज तम। इन तीनों गुणों से निर्मित प्रकृति को काटने की क्षमता आ गयी तब वही साधक क्षत्रिय है। *”बाहू राजन्य: कृत: ” उस समय वह इष्ट के भुजाओं के बल पर होता है अर्जुन की तरह और जब ब्रम्हा की अनुभूति प्राप्त कर लेता है तो उस समय परमात्मा उसमें प्रवाहित हो जाता है। वह ब्रम्ह में प्रवेश पा लेने की सारी योग्यता वाला हो जाता है इसलिए ब्राम्हण है। उस परमात्मा की बुद्धि मात्र यंत्र है। उसके माध्यम से परमात्मा ही निर्णय देता है, बोलता है इसलिए ब्राम्हण को परमात्मा का मुख कहा गया है। भगवान सर्वांगीण पवित्र है किंतु उन प्रभु के अंगों में से कोई अंग विशेष मनुष्य के हित में विशेष सहायक और पवित्र है तो वह है चरण। ”
*बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा”*
आदि गुरु भगवान शिव के चरण से गंगा जी निकली हैं। सद्गुरुओं के चरण रज से अगणित नराधमों का उद्धार हुआ है। उसी चरण रज के ही प्रभाव से अंगुलिमाल और वाल्मीकि अपना रक्तपात का मार्ग बदल कर परमात्मा का मार्ग पकड़ा। अर्थात कहने का आशय है कि
*जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते।*
*वेदाध्यायी भवेद् विप्र ब्रम्हा जानाति ब्राम्हण:।।* अर्थात इस धरा धाम पर जन्म लेने वाला हर एक प्राणी शूद्र है। संस्कारात् द्विज उच्यते स: मानें वह परमात्मा उसका आंशिक आकार जहां सद्गुरु की कृपा से हृदय देश में जागृत हुआ तहां वह द्विज है उसका दूसरा जन्म हो गया। और जब चिन्तन और सूक्ष्म हुआ तो वही परमात्मा अपनी जानकारी प्रदान करने लगते हैं इष्ट के निर्देशन के अनुरूप चलने की क्षमता आ जाती है वही वेदाध्ययी है विप्र है। और जब इष्ट के निर्देशन में चलते-चलते जब मूल का स्पर्श प्राप्त कर लेता है उसे विदित कर लेता है तो वही ब्राह्मण है ब्रम्ह जानाति ब्राम्हण: हो जाता है। वास्तव में ये साधन पथ के चार सोपान है आरंभ में निकृष्ट, मध्यम, उत्तम, अति उत्तम एक ही पथिक को इन चार सोपानों से गुजर कर उस शास्वत सनातन ब्रम्ह में प्रवेश पाना होता है, यह साधन पथ है धर्माचरण है। ब्रम्ह में प्रवेश और स्थिति के साथ ही वह किसी श्रेणी अर्थात (शूद्र वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण)के कर्म का कर्ता नहीं रह जाता जिसे पाना था पा लिया जब आगे कोई सत्ता नहीं है तो क्रिया करके और किसे ढ़ूढे? आदि गुरु शंकराचार्य इसी स्तर पर पहुंच कर कह उठते हैं *न ब्राम्हणों न क्षत्रिय: न वैश्यो न शूद्रश्चिवदानन्द रूप: शिवोहम् शिवोहम्* अर्थात अब मैं न शूद्र हूं, न वैश्य, न क्षत्रिय, न ब्राम्हण, – परम आनंद स्वरूप मय है। मैं कैवल्यधाम, कल्याण स्वरूप शिवमात्र शेष हूं। यह अवस्था सबको मिलती है। तो कहने का आशय है कि जो हमारे पूर्वजों अनादिकालीन ऋषि-मुनियों की शोध स्थली रही है वह जन्मना वर्ण-व्यवस्था को नकारता है; बल्कि कर्म के आधार पर (भजन के आधार पर) वर्गीकृत हैं जो महापुरुष सद्गुरु की शरण में भजन चिंतन का विषय है। उन्हीं सद्गुरु की कृपा से भील कन्या माता शबरी संत शिरोमणि हो गयी, तालाब में मिले अनाथ कबीर नाथों के नाथ काया के बीर कबीर हो गये, दस्यु सरगना रत्नाकर वाल्मीकि हो गये, अनाथ रामबोला सनाथ तुलसी दास हो गये । ऐसे ही अनेकानेक नराधमों का उद्धार और हृदय परिवर्तन आज समय के महापुरुष सद्गुरु परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की चरणों की सेवा के प्रभाव से हो रहा है उनके गुरु महाराज स्वामी श्री परमानंद जी महाराज जो चित्रकूट के घनघोर जंगल में तपस्या रत थे उनके प्रभाव से न जाने कितने दस्युओं का हृदय परिवर्तन हुआ और वे कुमार्ग को छोड़कर सन्मार्ग पर चल पड़े। तो हमें अपने पुरोधा अनादिकालीन ऋषि-मुनियों के आत्मिक शोध के तौर-तरीकों को फालो करना चाहिए उन्हें जमीनी धरातल पर लागू करने के लिए यथार्थ गीता के मार्गदर्शन पर चलना चाहिए जिससे हमारे विश्व गुरु होने का अस्तित्व शास्वत चिरंजीवी रहे।






