अम्बेडकर नगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
गृह प्रवेश पर यथार्थ गीता पाठ का आयोजन
परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के शिष्य विजय महाराज जी ने दिया आशीर्वचन

जनपद अम्बेडकर नगर के जलालपुर तहसील अंतर्गत भियांव ग्राम सभा के कुटिया रफीगंज में शिक्षिका मोहिनी जायसवाल पत्नी ओमकार गुप्ता के निजी आवास के गृह प्रवेश के पावन अवसर पर यथार्थ गीता पाठ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर यथार्थ गीता पाठ करने वाली डीहभियांव यथार्थ मंडली द्वारा वाचन किया गया। लगभग 11 बजे यथार्थ गीता पाठ की शुरुआत हुई और दूसरे दिन लगभग प्रातः संपन्न हुआ। इस अवसर पर श्री परमहंस आश्रम भेदौरा के महन्त पूज्य विजय महाराज जी पहुंचकर पूज्य श्री स्वामी जी के की विद्या के बारे में विस्तृत जानकारी सैकड़ों भक्तों में बताया। एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि यथार्थ गीता भगवान के आदेश से पूज्य गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज जी द्वारा लिखा गया। यथार्थ गीता का एक एक अक्षर शब्द वाक्य श्लोकादि सब भगवान के द्वारा बोला गया और पूज्य श्री स्वामी जी ने उसे लिपिबद्ध किया है। उन्होंने बताया कि जैसे महापुरुष होते आयें है आज तक, वैसे ही पूज्य श्री स्वामी जी आज श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ में सशरीर विराजमान हैं और सूक्ष्म शरीर से संसार के कण-कण में विद्यमान हैं , जो भी आर्त भक्त जन , श्रद्धालु, अनुयाई, उनके शिष्य संत महात्मा जिस भी देश काल परिस्थिति में उन्हें याद करते हैं पूज्य गुरुदेव भगवान वहीं से सूक्ष्म शरीर से संभालते हैं, योग क्षेम करते हैं। पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि सद्गुरु की रहनी स्वरुपस्थ होने के बाद संसार के कण-कण में निराकार रहती है।
बिनु पग चले सुनहि बिनु काना।
कर बिनु करम करहिं विधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि —
एषा ब्राम्ही स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेअ्पि ब्रम्हनिर्वाणमृच्छति।।
अर्थात महापुरुष समुद्रवत होते हैं। वे पूर्ण संयमी और प्रत्यक्षतः परमात्मदर्शी हैं। ऐसे महापुरुष ब्रम्हनिष्ठा में स्थित रहते हुए शरीर के अंतकाल में भी ब्रम्हानंद को ही प्राप्त है। पूज्य विजय महाराज जी ने बताया कि जो भी इस भगवत्पथ में प्रवेश करेगा वह एक न एक दिन भगवान को भा जायेगा। उन्होंने बताया कि भगवत्पथ में बीज का नाश नहीं होता । गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन 
नेहाभिक्रमनाशोअ्स्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात।।
अर्थात ईष्ट के आश्रित भजनानंदी साधक केवल भगवत्पथ में दो कदम चल भर दे ( जो गृहस्थ आश्रम में ही रहकर चला जा सकता है, साधक तो चलते ही हैं) बीज भर डाल दें तो प्रकृति में कोई क्षमता नहीं, ऐसा कोई अस्त्र नहीं कि उस सत्य को मिटा दे।






