अम्बेडकर नगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव’
अज्ञान से आच्छादित संसार को दृष्टि प्रदाता यथार्थ गीता
पुण्यतिथि पर यथार्थ गीता पाठ का आयोजन 
सृष्टि के अनादि काल से लेकर आज तक महापुरुषों द्वारा कृत शास्त्रों में ईश्वरीय संदेश की जितनी स्पष्ट व्याख्या यथार्थ गीता में दी गई है उतनी स्पष्ट व्याख्या शायद ही किसी अन्य शास्त्रों में हुई हो। यथार्थ गीता खुद तो कालजयी है ही और जो इसे मनसा वाचा कर्मणा से अंगीकार कर इसके बताये मार्ग पर चलता है तो वह भी कालजयी हो जाता है। कारण कि यह साक्षात परमात्मा की दिव्य वाणी है और मोक्षदायिनी शास्त्र है इसे पढ़ लेने के बाद अन्य शास्त्रों के विषय में जानें की जरूरत नहीं है। भगवान वेदव्यास ने जिन्होंने श्रुतज्ञान की परम्परा को तोड़ते हुए चार वेद छः शास्त्र अट्ठारह पुराण की रचना की और उक्त ग्रंथों में पूर्व संचित भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञानराशि को संकलित कर अंत में स्वयं भीष्म पर्व में निर्णय दिया कि —
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरै:।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मादि्नि:सुता।।
इसलिए महर्षि वेदव्यास जिन्होंने अपने योग बल से संजय को दृष्टि देकर अज्ञान से आच्छादित अंधे धृतराष्ट्र को धर्म -अधर्म के युद्ध को देखने का माध्यम बने। ठीक इसी प्रकार आज लगभग 52 सौ वर्षों बाद फिर वही स्थिति संसार में उत्पन्न हो गई है। भगवान वेदव्यास के काल महाभारत काल में एक कुरुक्षेत्र था लेकिन आज धर्म के नाम पर अज्ञान से आच्छादित पूरा संसार कुरुक्षेत्र बना हुआ है ऐसे में कण- कण में विद्यमान अंतर्यामी गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने ईश्वरीय आदेश से इस कुरुक्षेत्रीय संसार को मुक्त कर धर्मक्षेत्रीय संसार बनाने की दृष्टिगत दिव्य ईश्वरीय वाणी अमृतमय यथार्थ गीता की रचना की । इसी यथार्थ गीता की दिव्य दृष्टि से अज्ञान से आच्छादित पूरा संसार कुरुक्षेत्र से निकल कर धर्मक्षेत्र की ओर बढ़ेगा। धर्म-कर्म ,भक्ति ,यज्ञ ,गो कर्मकांड योगादि मामले में अज्ञानता वश संसार आज तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। अनादि काल से अवतरित महापुरुषों के बताये मार्ग से भटक चुका है यथार्थ से कोसों दूर है। ऐसे में यथार्थ गीता ही एकमात्र ऐसा शास्वत धर्मशास्त्र है जो निर्विवाद है मज़हब मुक्त है मानवमात्र के लिए है जिसके बताये मार्ग पर चलने से संसार विधर्मियों से और धार्मिक भ्रांतियों से मुक्त हो जायेगा । इसलिए आज विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज महर्षि वेदव्यास के रोल में खड़े हैं और उनकी पवित्र कृत यथार्थ गीता संजय के रोल में है जो अज्ञान से आच्छादित धृतराष्ट्र रूपी संसार को धर्म –अधर्म , सत्य- असत्य, विद्या -अविद्या, माया और भगवान विषयक ज्ञान प्रदान कर रहा है। अनादि काल से महापुरुषों द्वारा आज तक जितने भी शास्त्र लिखे गए हैं उन शास्त्रों से इतर यथार्थ गीता एक यूनीक अप्रतिम धर्म शास्त्र है इसमें विधर्मियों द्वारा किए गये गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं है, पोंगापंथियो के भ्रांतियों की भी कोई गुंजाइश नहीं है, धर्म के सियासी दुकानदारों की दुकानदारी भी नहीं चल पायेगी। यह संसार के लिए सर्वसुलभ शास्त्र है। यथार्थ गीता को गुरुदेव भगवान सभी भक्तों को कम से कम चार से छः बार आवृत्ति के लिए कहते हैं और यथार्थ गीता पाठ के लिए भक्तों को आदेशित करते हैं और मुफ्त में यथार्थ गीता बंटवाते हैं। उन्हीं के आदेशों के पालनार्थ अब हर भक्त यथार्थ गीता पाठ अपने घर पर करवाते हैं चाहे गृह प्रवेश हो, शादी विवाह हो, ब्रम्हभोज हो, पुण्यतिथि हो, अथवा तीज त्यौहार, जन्मदिन आदि हो, भक्तगण उनके आदेश के अनुपालन में
शिरोधार्य कर यथार्थ गीता पाठ का आयोजन कराते हैं। इसी तरह आज अम्बेडकर नगर जिले में ही बंदीपुर ब्लाक अंतर्गत आशापार ग्राम सभा में रमेश सिंह के घर यथार्थ गीता पाठ उनकी मां के पुण्यतिथि के शुभ अवसर पर आयोजन किया गया। उनकी मां की स्मृति में यथार्थ गीता पाठ उनकी मां की दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे इस दृष्टिगत भगवान की इस ईश्वरीय वाणी को, विद्या को हजारों भक्तों ने अपने कर्णकुहरों से सुनकर कृतार्थ हुए। इस अवसर पर भंडारे का आयोजन हुआ, श्री परमहंस आश्रम मुस्तफाबाद के पूज्य रावण महराज जी का भजन कीर्तन का कार्यक्रम भी सकुशल संपन्न हुआ ।






