National media news ( nm news)

सम्पादक देवेन्द्र राय

May 14, 2026 12:46 am

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मोहरूपी रात्रि से परम प्रकाश परमात्मा के नवीन दिशा में रत होना ही नव रात्रि है —- स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

मिर्जापुर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”

मोहरूपी रात्रि से परम प्रकाश परमात्मा के नवीन दिशा में रत होना ही नव रात्रि है —- स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

दसवें दिन दशहरा यानी दश- हारा , दशों इंद्रियों की बहिर्मुखी प्रवाह की हार/ निरोध ही दशहरा है।

गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहु। आरत अधिकारी जहं पावहि।।

अनादिकाल से ऋषि-मुनियों के गूढ़ से गूढ़ आध्यात्मिक मिथकों के बाल की खाल निकालने वाले, यथार्थ व्याख्याकार संत महात्माओं श्रद्धालुओं भक्तों के हृदय सम्राट भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने अपने उद्बोधन में भक्तों को बताया कि मोह रुपी रात्रि से जब हम हृदय स्थित अंतर्यामी परमात्मा की ओर जिस दिन से साधना प्रारंभ करते हैं उसी दिन से जग गये एक नवीन दिशा में रत हो गये, इसी को नवरात्रि कहते हैं। उन्होंने देवी, राम, दशहरा आदि गूढ़ तत्व की जटिलता को सरलीकरण करते हुए बताये कि ईश्वर का निवास सभी प्राणियों के अंतःकरण में है, ईश्वरीय शक्ति ही देवी है, जिसके द्वारा सर्वव्यापी भगवान ( ईष्ट) के नाम जप, ईष्ट के ध्यान, लीला तथा धाम में मन को रमाया/ टिकाया जाता है परन्तु ईश्वरीय शक्ति बहिर्मुखी होकर सांसारिक विषयों में बिखरी हुई है, उसी शक्ति को इंद्रिय संयम द्वारा अंतःकरण में अर्जित करते जाना ही “देवी” पूजा है। यहीं साधक के अराधना पथ में नवरात्रि (नव इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना) बन जायेगी और दसवें दिन दशहरा यानी दश- हारा, दसों इंद्रियों की बहिर्मुखी (सांसारिक) प्रवाह की हार यानी निरोध होते ही अनुभव (ज्ञान/ विज्ञान/ राम) द्वारा मोह रूपी रावण पर जीत हासिल हो जाती है, और साधक को भगवत्ता मिल जाती है। पूज्य गुरुदेव भगवान ने बताया कि ओम राम अथवा शिव अनादि काल से यही दो ढाई अक्षर के नाम का जप किया जाता है, यही नाम ही सद्गुरु भगवान के पास पहुंचा देगा। उन्होंने बताया कि ओम् अर्थात ओ माने वह अविनाशी परमात्मा अहं माने आप स्वयं अर्थात वह अविनाशी परमात्मा सबके हृदय में वास करता है इसलिए भगवान को हृदय में ढूंढ़े ह्रदय में ही मिलेंगी जिसको पाने की कुंजी सद्गुरु होते हैं। राम अर्थात रमन्ते योगिन यस्मिन स: राम: , योगियों के ह्रदय में रमण करने वाले ही राम हैं अर्थात यहां भी एक ईश्वर की आराधना हृदय में ही विधान है, अन्यत्र नहीं। शिव अर्थात प्रकृति की अनंत सीमाओं से परे जो ऊपर बैठा है यहां भी है हमारे चारों तरफ है वही शिव है। पूज्य गुरुदेव भगवान ने कहा कि जैसे जैसे ओम् जप करते जायेंगे दो एक महीने में आपको आभास होने लगेगा कि आपके आगे पीछे कोई है उसी को कहते हैं भगवान का हृदय से रथी होना, भगवान धीरे धीरे आपको माया मोह आदि प्रकृति के झंझावातों से उठाकर एक नई दुनिया परमात्मा के परिक्षेत्र में उठा कर कर देगा इसी को नवरात्रि कहते हैं फिर मोहरूपी रावण का बध होगा और दशहरा का दिन आयेगा।

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Author: NM News live

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