जौनसार-बावर को पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने की उठी मांग
किशाऊ बांध के बीच तेज हुआ संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा
चकराता उत्तराखंड।
सम्पादक देवेन्द्र सिंह राय
जौनसार-बावर की पहाड़ियों से इस वक्त एक ऐसी मांग सामने आ रही है, जिसने क्षेत्र की जनजातीय पहचान, जमीन, जल-जंगल-जमीन और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़े सवालों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
किशाऊ बांध परियोजना को लेकर क्षेत्र में लगातार विरोध, बैठकों और महापंचायतों का दौर चल रहा है। ग्रामीण परियोजना की ऊंचाई, प्रस्तावित डूब क्षेत्र, जमीन, विस्थापन और पुनर्वास जैसे मुद्दों को लेकर अपनी चिंताएं सामने रख रहे हैं।
इसी बीच अब जौनसार-बावर को संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने की मांग भी जोर पकड़ती दिखाई दे रही है।

लेकिन इस मुद्दे को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर पाँचवीं अनुसूची है क्या?
पाँचवीं अनुसूची भारतीय संविधान में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन तथा उनके हितों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था से संबंधित है।
हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वर्तमान में जौनसार-बावर पाँचवीं अनुसूची के तहत अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्र नहीं है।
इसलिए पाँचवीं अनुसूची के तहत मिलने वाली विशेष संवैधानिक व्यवस्था यहां स्वतः लागू नहीं मानी जा सकती।
अब सवाल उठता है कि आखिर जौनसार-बावर को पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग क्यों उठ रही है?
इस मांग के पीछे क्षेत्र की जनजातीय पहचान, पारंपरिक जीवन-पद्धति, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों को विशेष संवैधानिक संरक्षण देने की मांग बताई जा रही है।
आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि जौनसार-बावर की अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान है और क्षेत्र से जुड़े बड़े विकास कार्यों में स्थानीय लोगों की आवाज को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए
किशाऊ बांध बना बड़ा मुद्दा
अब बात करते हैं किशाऊ बांध परियोजना की।
टोंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना को लेकर क्षेत्र में लंबे समय से सवाल और चिंताएं सामने आती रही हैं।
ग्रामीणों की मुख्य चिंता जमीन, विस्थापन, आजीविका, पर्यावरण और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को लेकर है।
विरोध कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोध में नहीं हैं।
लेकिन उनका सवाल है कि अगर विकास की कीमत उनकी जमीन, घर, खेत, आजीविका और पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक पहचान के रूप में चुकानी पड़े, तो ऐसे फैसलों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
वहीं परियोजना के पक्ष में इसे जल संसाधन, सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसी आवश्यकताओं से जोड़कर देखा जाता है।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है—
विकास और स्थानीय लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए
पाँचवीं अनुसूची की मांग का संवैधानिक रास्ता
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर जौनसार-बावर को पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने की मांग आगे बढ़ती है, तो इसका रास्ता क्या होगा?
सिर्फ किसी सभा या महापंचायत में प्रस्ताव पारित कर देने से पाँचवीं अनुसूची लागू नहीं हो जाती।
इसके लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा।
राज्य सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। क्षेत्र की जनजातीय आबादी, भौगोलिक स्थिति और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों सहित संबंधित पहलुओं का परीक्षण किया जा सकता है।
इसके बाद केंद्र सरकार के स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है और अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने के लिए राष्ट्रपति की अधिसूचना आवश्यक होती है।
यानी यह एक औपचारिक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे निर्धारित चरणों के माध्यम से ही आगे बढ़ाया जा सकता है।
ग्रामीणों के सामने कई बड़े सवाल
अब जौनसार-बावर के ग्रामीणों के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं।
क्या सरकार पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग पर गंभीरता से विचार करेगी?
क्या किशाऊ बांध से प्रभावित होने वाले गांवों और परिवारों का विस्तृत सामाजिक और आर्थिक आकलन किया जाएगा?
जिन परिवारों की जमीन, मकान, खेत और आजीविका प्रभावित होगी, उनके पुनर्वास और पुनर्स्थापन की क्या व्यवस्था होगी?
मुआवजे का आधार क्या होगा?
क्या प्रभावित ग्रामीणों की आपत्तियों और सुझावों को परियोजना की प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व दिया जाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या जौनसार-बावर के विकास का मॉडल यहां की सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा
महापंचायतों में उठ रही आवाज
किशाऊ बांध को लेकर आयोजित महापंचायतों में स्थानीय लोगों ने अपनी चिंताएं खुलकर सामने रखी हैं।
ग्रामीणों और आंदोलन से जुड़े लोगों की ओर से कहा जा रहा है कि उनकी लड़ाई केवल एक परियोजना के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह जल-जंगल-जमीन और पारंपरिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।
वहीं प्रशासन और सरकार के सामने चुनौती यह है कि परियोजना के विकास संबंधी उद्देश्यों और स्थानीय लोगों की चिंताओं के बीच ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिसमें कानून का पालन भी हो और प्रभावित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो
पाँचवीं अनुसूची और किशाऊ बांध—दोनों मुद्दों को समझना जरूरी
यहां एक बात साफ तौर पर समझना जरूरी है।
जौनसार-बावर को पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग एक संवैधानिक मांग है।
जबकि किशाऊ बांध से जुड़े भूमि, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण, मुआवजा और प्रभावित परिवारों के अधिकार अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के तहत तय होंगे।
इसलिए दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए जन-विमर्श का हिस्सा जरूर बन रहे हैं, लेकिन इनके कानूनी रास्ते और प्रक्रियाएं अलग-अलग हैं।
फिलहाल जौनसार-बावर में पाँचवीं अनुसूची की मांग और किशाऊ बांध का मुद्दा एक बड़े जन-विमर्श का रूप लेता दिखाई दे रहा है।
अब नजर इस बात पर है कि सरकार इस संवैधानिक मांग पर क्या कदम उठाती है, और किशाऊ बांध से प्रभावित होने वाले लोगों की जमीन, आजीविका, पुनर्वास और अधिकारों से जुड़ी चिंताओं का समाधान किस तरह किया जाता है।






