National media news ( nm news)

सम्पादक देवेन्द्र राय

May 14, 2026 2:41 am

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श्री परमहंस आश्रम फत्तेपुर आजमगढ़ में संतों की अमृतवाणी की वर्षा 

आजमगढ़ ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”

नव वर्ष अर्थात ‘नव द्वारे पुरे देही’ से उपराम स्वरूपानंद में स्थिति

श्री परमहंस आश्रम फत्तेपुर आजमगढ़ में संतों की अमृतवाणी की वर्षा 

अनादिकालीन ऋषि-मुनियों की आध्यात्मिक ज्ञान ब्रम्हविद्या व गीतोक्त साधना की विरासत को पूरे विश्व में प्रचारित- प्रसारित करने वाले 21 वीं सदी के युग महापुरुष अनंत विभूषित यथार्थ गीता के प्रणेता परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की अद्भुत कृपा से आज श्री परमहंस आश्रम फत्तेपुर आजमगढ़ में नववर्ष के शुभ अवसर पर यथार्थ गीता पाठ व विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की कृपा से यहां के संत श्री कमलेश महाराज जी के तत्वावधान में आयोजित इस वृहद कार्यक्रम में हजारों श्रद्धालुओं भक्तों ने श्री संतो के मुखारविंद से जन्म-जन्मांतर से चली आ रही जन्मों की अनन्त श्रंखलाओं से मुक्त करा देने वाली परावाणी का श्रवण किया। अपने मुखारविंद से परावाणी गीतोक्त साधना को हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं भक्तों में उपदेशित करने वाले श्री संतो में श्री कृष्णा महाराज, श्री सुदामा महाराज, श्री विनय महाराज, श्री पहलवान महाराज, श्री सत्यपाल महाराज, श्री सत्यपाल महाराज, श्री सनातन महाराज, श्री रामजतन महाराज, श्री गोविन्द महाराज व श्री मिस्त्री महाराज जी सम्मिलित रहे। उपस्थित पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के कृपापात्र शिष्यों ने भक्तों को बताया कि समय के कालचक्र में जीव अनंत जन्मों की कष्टित यात्रा करता रहता है जन्मा तो जन्मदिवस, शादी किया तो सालगिरह और साल का शुरूवात हुआ तो नववर्ष आदि-आदि उत्सव मनाता है और इन उत्सवों के बीच एक दिन मर जाता है तो उसका ब्रम्हभोज भी हो जाता है। वास्तव में नववर्ष का अर्थ “नव द्वारे पुरे देही” अर्थात शरीर रूपी घर के नौ द्वार (दो कान दो आंख दो नासिका एक मुख उपस्थ एवं पायु) जो मायिक प्रपंच से प्रपंचित है इससे उपराम होकर हमें ईश्वरीय पराग में सुवासित होना है अर्थात ईश्वरीय स्वरुप में स्थित होना है। जीव की यह अवस्था तब आयेगी कि जब हम “*मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्तवैवमात्मानं मत्परायण:।।* अर्थात उसे समय के महापुरुष सद्गुरु की शरणागत होकर एक ईश्वर की आराधना, अनन्य भाव से उनमें स्थित होकर सद्गुरु की शरण-शानिध्य में रहकर उन्हीं में एकीभाव से एकीकरण हो जाए। ऐसा करने से जीव सद्गुरु के संरक्षण में सद्गुरु की कृपा की पात्रता में पास हो जाता है । फिर “*पुनरपि जननं पुरनपि मरणं। पुनरपि जननी जठरे शयनम्।*।” पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के सभी शिष्यों ने यही बताया कि जीव का लक्ष्य है परमात्मा का बोध व परमात्मामय हो जाना। उन्होंने बताया कि वह जन्म सराहनीय है जिसके पीछे मृत्यु नहीं है वह मृत्यु सराहनीय है जिसके पीछे जन्म न हो। जनरपि उसका वह नवीन जन्म लेता है उसके लिए ही दिन वही क्षण वही माह वही साल नववर्ष कहलाता है। जीव सद्गुरु की शरण से उनकी कृपा से वह एक दिन कृपा का अथाह सागर भव सरिता का खेवनहार सद्गुरु हो जाता है। नव द्वारे पुरे देही ( अर्थात दो कान दो नेत्र दो नासिका छिद्र एक मुख उपस्थ एवं पायु ) वाले शरीर रूपी घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर अपने ही स्वरुप में मन बुद्धि और प्रकृति से परे स्वयं में स्थित स्वरूपानंद में ही स्थित रहता है। “सर्व कर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं वशी।”

नव द्वारे पुरे देही नैव कुर्वत्र कारयत।।”यही है नववर्ष जो अनादि कालीन ऋषि-मुनियों की शोध का परिणाम है उससे हम आप्लावित रहें।

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Author: NM News live

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