संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
कुत्ता कल्चर की कहानी स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज के शिष्य बच्चा महाराज की जुबानी
इस धरा – धाम पर अनादि काल से गुरु शिष्य परंपरा के एक सुंदर रचना का अध्यात्मिक जगत में लंबी फेहरिस्त है। जो देश काल परिस्थिति के अनुसार विभिन्न मतैक्य के अनुसार विभिन्न गुरु दरबार,गुरु घराने, परमहंस दरबार, अपने अपने रहनी पूजा-अर्चना के अनुसार जानें जाते हैं। परमहंसों के दरबार में इसी तरह एक तीसरी पीढ़ी का दरबार पूज्य श्री परमहंस सत्संगी महाराज , उनके शिष्य पूज्य श्री स्वामी परमानंद जी महाराज व फ़िर पूज्य श्री परमहंस स्वामी
परमानंद जी के शिष्य परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी का दरबार का भरत खंडे , जम्बू द्वीप आर्यावर्त भारत में जगत प्रसिद्ध है। आज समय के महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ईश्वरेच्छा से श्री मद्भागवत गीता का यथार्थ भाष्य यथार्थ गीता को लिखकर पूरी दुनिया में चर्चा में हैं। अब चलते हैं कुत्ता कल्चर पर जो आज सुर्खियों में है शहरों से लेकर देहात तक अपना पांव पसार लिया है। देहात के कुत्ते जब इन्हें देखते हैं तो अपनी भाषा में इन्हें क्या क्या कहकर भौंकते हैं ये वही जानै। तरह तरह के कुत्ते डाबर मैन लेब्राडोर जर्मन शेफर्ड आदि आदि तरह तरह के कुत्ते अपने आवश्यकता अनुसार लोग पाल रहे हैं। कुत्ता कल्चर से कहीं फायदा है तो कहीं नुकसान भी है। यहां तक कि हमारी संस्कृति को भी कुत्ता कल्चर प्रभावित कर रहा है जिसकी
जीवंत व्याख्या पूज्य श्री स्वामी जी के शिष्य पूज्य बच्चा महाराज जी अक्सर अपने प्रतीकात्मक प्रवचन में बताया करते थे। वे कहते थे कि पहले के जमाने में बारात में घी में चुपड़ी रोटियां खाने को मिलती थी और उसी तरह घी और रोटी की तरह वर वधू के संबंध भी आजीवन चिपके रहते थे। आज बारात में पापड़ खाने को मिलते हैं जैसे पापड़ खट से टूट जाता है वैसे ही वर वधू के संबंध भी खट से टूट जा रहे हैं। पूज्य बच्चा महाराज जी कहते थे कि पहले जमाने में दरवाजे पर अतिथियों के स्वागत में लिखा होता था ,”अतिथि देवो भव”फिर थोड़ा और समय बीता तो दरवाजों पर लिखा जाने लगा *सुस्वागतम* और अब दरवाजों पर लिखा जाने लगा है *कुत्तों से सावधान* पूज्य बच्चा महाराज जी कहते थे कि कुत्ते घर के अंदर नहीं रहते फिर भी दरवाजे पर घर का
मालिक लिखा देता है कि जिससे कोई अतिथि कुत्ते के डर से अंदर न आने पाये और न ही हमें उसकी सेवा करना पड़ेगा। बाहर से ही बाहर चला जाय। और यदि कुत्ता वाकई अंदर है और कोई अतिथि मेजबान को अपना दुखड़ा सुनाने के लिए घर से निकला है तो अंदर पहुंचते ही कुत्ता भौं भौं कर अतिथि पर टूट पड़ता है मालिक पकड़ेगा डागी चुप डागी चुप उसकी सीकड़ी पकड़ेगा डागी को पकड़ेगा चूमे चाटेगा फिर उसे बांधकर बिठायेगा तब अतिथि की तरफ मुड़ेगा इतने में अतिथि बेचारे का अपना दुखड़ा जो सुनाने आया था वो भूल चुका होता है। फिर मेजबान अतिथि को कुत्ते के बारे में घंटो तक बात करता है कि डागी ने फला को काट लिया फला को दौड़ा लिया फला का मुह चाट लिया फला फला दिन बीमार हुआ इतना उतना रुपया लगा , डेली का खर्च इतना डागी पर पड़ता है फला फला । डागी के डींग हांकने में मेजबान को न तो अतिथि के आने की उद्देश्य की चिंता है और न ही उनके स्वागत वंदन भोजन पानी आदि की। पहले जमाने में अतिथि आते थे तो चार कदम आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया जाता था यथोचित यथायोग्य सेवा सत्कार किया जाता था उनको भोजन प्रसाद ग्रहण कराकर कुशलक्षेम पूछा जाता था ठहरने का उत्तम प्रबंध किया जाता था यहां तक कि दुश्मन भी दरवाजे पर आता था तो उसे भी ऊंचा पीढ़ा दिया जाता था। ऐसा नहीं है कि कुत्ता कल्चर केवल अतिथि के लिए समस्या है बाल बच्चों के लिए भी समस्या है जब कुत्ता
मालिक घर के अंदर प्रवेश करता है तो उसका बच्चा उसकी गोंद का, लाड प्यार का भूखा रहता है लेकिन डागी दौड़कर जब मालिक के गोंद में पहुंच जाता है तो बच्चा छटपटा के रह जाता है इतना ही नहीं बच्चे को टहलाने के बजाय डागी को टहलाना बच्चे को नहलाने खिलाने पिलाने आदि के बजाय कुत्ते को टहलाना पिलाना आदि फैशन हो गया है। गार्जियनशिप की छाया बच्चों के सर से धीरे धीरे उठ जाती है यही परिणाम जब बच्चा बड़ा होता है तो बुजुर्गा अवस्था में कुत्ता मालिक की जिंदगी भी कुत्ते जैसी ही हो जाती है घर से लेकर वृद्धा आश्रम तक कुत्ते की जिंदगी जीता रहता है और एक दिन कुत्ते की जिंदगी जीते जीते मर जाता है। इतना ही नहीं कुत्ता कल्चर विवाद की जड़े भी बना हुआ है इनसे विवाद संबंधित फाइलें माननीय न्यायलयों में भरी पड़ी हैं। उदाहरणार्थ जानी मानी सांसद महुआ मोइत्रा और उनके वकील के बीच कुत्ते के हकदारी को लेकर विवाद कोर्ट में चल रहा है। ऐसे तमाम उदाहरण है जहां कुत्ता कल्चर के कारण वर वधू में बच्चा बाबा की तर्ज पर पापड़ की तरह संबंध खट से टूट जा रहे हैं। पूज्य बच्चा महाराज जी की चिंता जायज है स्मरणीय है विचारणीय है। कुत्ता कल्चर पश्चिम की देन है। जिस तरह से पश्चिम कल्चर की शिक्षाएं रहन सहन विचार से हमारी संस्कृति पर प्रहार हो रहा है वैसे ही कुत्ता कल्चर से भी प्रहार हो रहा है। पश्चिम में कुत्ता कल्चर अनिवार्य सा हो गया है वहां एकाकी जीवन और एकल परिवार की संस्कृति है यहां तक कि माताएं सुंदरता को बनाए रखने के लिए अधिकांशतः बच्चे आपरेशन से पैदा करती हैं और बच्चों को स्तन पान नहीं कराती । हमारे कल्चर में संयुक्त परिवार का समावेश है एक दूसरे की भावनात्मक संबंधों का सृजनात्मक शक्ति है। हमारे यहां माताएं सहज प्रसव कराती हैं भीमकाय जैसे पुत्र को माता कुन्ती ने जन्म दिया। स्तन पान कराती हैं जिसको पीकर एक से एक शूर वीरों के कहानियों की लंबी फेहरिस्त है। स्तन पान से मां और बच्चे के बीच जो सहज आत्मीय संबंधों का सृजन होता है वह मां और बेटे के संबंध को जीवन के अंत तक बांधे रहता है इसी का प्रभाव है कि हमारे यहां घर घर आज भी श्रवण कुमार है। हमारी सभ्यताएं और संस्कृति अमिट है मिश्र की सभ्यता, चीन की सभ्यता, मेसोपोटामिया की सभ्यता , ईरान की सभ्यता मिट गयी लेकिन हमारी सैंधव सभ्यता आज भी जिंदा है उसकी पूजा पद्धति साफ सफाई वास्तु शास्त्र से बने मकान आदि आज भी हमारे लिए प्रासांगिक हैं।
इंग्लैंड एक छोट सा देश 14 वीं 15 वीं सदी में नेपाल को छोड़ पूरे विश्व में कोलोनि स्थापित किया था
लेकिन सैंधव निवासियों की सोच इंग्लैंड वासियों से हजारों वर्ष एडवांस थी कारण कि सैंधव सभ्यता के लोगों ने अफगानिस्तान में जाकर हमला करके दो कोलोनी शोर्तगुई और मुंडीगाक स्थापित किया था। लेकिन सोने की चिड़िया और विश्व गुरु कहा जाने वाला भारत आज अपनी दुर्दशा का रोना रो रहा है। दुनिया को ज्ञान सिखाकर विश्व गुरु कहा जाने वाला भारत आज शास्त्र विहीन हो गया है । एक ईश्वर को छोड़ तैंतीस करोड़ देवी-देवता का चक्कर लगा कर आपस में बंटा हुआ है विखरा हुआ है। जिसकी आड़ में आज भी कालनेमि, रावण, जैसे असंत समाज को ईश्वर के नाम पर धोखा दे रहे हैं समाज को ठग रहे हैं और विश्व गुरु भारत को अंदर ही अंदर से खोखला कर रहे हैं। इससे बचने के लिए फिर से भारत को विश्व गुरु बनने के लिए समय के महापुरुष कालजयी विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज कृत यथार्थ गीता के मार्ग पर चलना होगा। गीतोक्त साधना पद्धति का अनुकरण करना होगा। तभी हम जाति – पात, सम्प्रदाय , ऊंच नीच की भावना से मुक्त हो पायेंगे । मानवता सामाजिक समरसता सद्भावना भाईचारा कायम रहेगी। 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
हस्ती इसीलिए जिंदा है कि यहां मानवता के पुजारी श्रृषियो मुनियों ने पूरी दुनिया को एक परिवार माना वसुधैव कुटुंबकम् और जीवो और जीने दो का नारा दिया कबीर तुलसी संत महात्माओं ने अपनी तपस्या से जो भी अनुभव किया उसका सार संकलन यथार्थ गीता में है । उसको पढ़ें अंधेरा मिटाएं उजाला फैलाएं दुनिया के साथ कंधों से कंधा मिलाकर चलें क्यों कि यथार्थ गीता मजहब मुक्त है यह आपको बराबरी का सम्मान देती है।






