National media news ( nm news)

सम्पादक देवेन्द्र राय

March 25, 2026 1:51 pm

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March 25, 2026 1:51 pm

स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के आध्यात्मिक आभा में भष्माशात हो जाते हैं भक्तों के दुख

संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
 स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के आध्यात्मिक आभा में भष्माशात हो जाते हैं भक्तों के दुख
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन: षष्टानीन्निद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।

पूरी दुनिया को अज्ञान से आच्छादित अंधेरे से निकाल कर अध्यात्मिक उजाले में पहुंचाने वाला धर्म प्राण भारत अनादिकाल से ऋषि-मुनियों संत महात्माओं का जन्मस्थली रहा है । अपने – अपने सद्गुरु के शरण सानिध्य में रहकर कठोर तपस्या के बाद ईश्वरीय जाग्रति होने के उपरांत उन्होंने पूरे विश्व के जनमानस को आलोकित किया और उस आलोक में पूरी दुनिया उनके बताये मार्ग पर चल पड़ी। चाहे भगवान श्री कृष्ण हों या भगवान राम बुद्ध महावीर आदि गुरु शंकराचार्य कबीर रैदास तुलसी स्वामी विवेकानंद आदि सभी महापुरुषों ने पहले खुद तपे फिर परिणाम में उन्हें जो मिला उसको उन्होंने निःस्वार्थ संसार को अर्पित किया। वह आध्यात्मिक ज्ञान ब्रह्म विद्या आश्रमीय अनुशासन गुरु घराने गुरु शिष्य परंपरा का आदर्श संगम जो आज के हजारों साल पहले था वह आज भी श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ में दिखाई देता है। विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी अलमस्त सर्वज्ञ सनातन संस्कृति के वाहक यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज अपने गुरु घराने की तीसरी पीढ़ी हैं । परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज के गुरु महाराज जी परमहंस स्वामी परमानंद जी महाराज दूसरी पीढ़ी, फिर उनके गुरु देव भगवान परमहंस परम पूज्य श्री सत्संगी जी महाराज प्रथम पीढ़ी। चाहे आश्रमीय अनुशासन हो, चाहे गुरु शिष्य के बीच मर्यादित आचरण हो, चाहे भक्तों और सत्यान्वेशी साधकों के बीच सुसंगत सुसभ्य शिष्टाचार हो सब परदादा गुरु के समय से लेकर आज तक आदर्शमय और दिव्य तरीके से चल रहा है। प्रातः ब्रम्हबेला में पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के सभी सत्यान्वेशी शिष्य जग जातें हैं तत्पश्चात गुरूदेव भगवान का 4 बजे आरती वंदन होता है फिर भजन पर बैठ जाते हैं फिर सभी शिष्य प्रातः लगभग पांच बजे पूज्य श्री स्वामी जी के साथ पहाड़ पर जाते हैं वहां केवल विरक्त ही जाते हैं गृहस्थ को सख्त मनाही है, वहां गुरुदेव भगवान अपने शिष्यों को ब्रम्ह विद्या का उपदेश करते हैं, तत्पश्चात जितने भी शिष्य हैं सभी अपने अपने अनुभव पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज से साझा करते हैं, गुरूदेव भगवान उनके अनुभव संबंधित शंकाओं का समाधान करते हैं। और इधर प्रातः पाच बजे से ही भक्तों को चाय और बिस्किट उपलब्ध रहता है। फिर सुबह पहाड़ से लौटने के बाद भक्तों को सत्संग हाल में परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज द्वारा भक्तों को लगभग 7 बजे प्रवचन सत्संग के माध्यम से आशीर्वचन प्रदान किया जाता है। फिर भक्तों सत्यान्वेशी शिष्यों साधकों सभी को अपने अपने पंगत में बालभोग मिलता है। भोजन प्रसाद ग्रहण करने के बाद जितने भी शिष्य हैं वे अपने अपने शांत एकांत में भजन करने लगते हैं। दोपहर एक बजे दिन में भोजन प्रसाद के लिए घंटी लगती है भक्त श्रद्वालु अपने पंगत में और संत महात्मा अपने पंगत में भोजन प्रसाद ग्रहण करते हैं। वीआईपी हो या नानवीआईपी किसी भी मजहब जाति के हों सभी को बराबर में पंगत में बैठकर भोजन लेना होता है और खुद अपनी थाली धोना होता है।
4 बजे भजन कीर्तन सत्संग हाल में होता है फिर कुछ देर बाद लगभग 4: 30 पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज का आगमन होता है फिर वे भक्तों संत महात्माओं को प्रवचन सत्संग के माध्यम से आशीर्वचन प्रदान करते हैं इस बीच यदि कोई गायक कलाकार भजन आदि सुनाने आ जाता है तो वह भी सुना सकता है । गुरुदेव भगवान उसको अध्यात्म परक बना कर भक्तों में कह देते हैं। फिर लोग एक एक करके गुरु देव भगवान को जो भी फूल पत्ती मीठा प्रसाद फल-फूल अंगवस्त्र चढ़ाकर गुरुदेव भगवान से अपनी अपनी पीड़ा कहते हैं फिर गुरूदेव भगवान उसका समाधान करते हैं कि धूना में प्रणाम कर लो विभूति ले लो जो भी मांगना हो मांग लो तुम्हारी श्रद्धा ही कृपा बनकर लौटेगी आदि आदि उनकी तकिया कलाम भाषा होते हैं। फिर भक्तजन धूना पर प्रणाम करते हैं वहीं मन्नत मांगते हैं। *करत करावत आप हैं पलटू पलटू शोर* देते तो परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद जी गुरु भगवान ही हैं लेकिन भक्तों को भेज देते हैं धूना पर। 6 बजे शाम को लगभग आरती वंदन होता है। फिर शिष्य गण भजन साधना में लग जाते हैं । 9 बजे लगभग शाम को अल्पाहार हल्का प्रसाद खिचड़ी मिलता है। फिर रात्रि में शिष्य गण भजन चिंतन में लग जाते हैं। ये है चौबीस घंटे की दैनंदिन जीवन शैली जो कड़े कठोर अनुशासन में रहकर तपस्यारत रहना पड़ता है। अब एक नजर डालते हैं उनकी भवसागर पार करा देने वाली धार्मिक पुस्तकों पर।
पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज द्वारा क्यों लिखी गई यथार्थ गीता?
यथार्थ गीता को ईश्वरीय वाणी क्यों कहा जाता है? इस शास्त्र को इतनी प्रसिद्धि क्यों मिली?
परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज अपनी साधना के चरमावस्था में थे। एक बार तपस्यारत के समय उन्हें अनुभव में दिखाई पड़ा कि उनके सिर के चारो तरफ केवल एक ऊंट चक्कर लगा रहा है । इस अनुभव का मायने भगवान से जानने की स्वामी जी ने इच्छा जाहिर की । भगवान ने बताया कि ऊंट उर अर्थात हृदय का प्रतीक है तुम्हारी तपस्या से तुम्हारी जन्म जन्मांतर के सारे संस्कार कट गये हैं अब केवल एक ऊंट चक्कर लगाने का मतलब तुम्हारा एक संस्कार बाकी है गीता लिखना है तुम्हें। परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने सोचा हमें भगवान को पाना है हमें पढ़ाई-लिखाई से क्या मतलब फिर भजन में लग गए अकस्मात फिर आकाशवाणी हुई कि गीता लिखना ही पड़ेगा तभी तुम्हें निवृत्ति मिलेगी। पूज्य श्री स्वामी जी ने भगवान से कहा कि प्रभु मैं तो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूं कैसे लिखूंगा? पुनः आकाशवाणी हुई कि मैं बोलूंगा और तुम लिखोगे। फिर क्या था भगवान ने बोला और पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज जी ने अक्षरशः उसे लिपिबद्ध कर दिया जो आज यथार्थ गीता के रूप में विश्व प्रसिद्ध है। इसीलिए यथार्थ गीता को भगवान के श्रीमुख से नि:सृत वाणी ईश्वरीय वाणी कहा जाता है जो श्रीमद्भागवत का यथार्थ भाष्य है जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को चौथी शताब्दी ईसा पूर्व कौरव पांडव के बीच हो रहे कुरुक्षेत्र में युद्ध के समय उपदेशित किया था। यह पूर्ण रूप से मजहब मुक्त है मानवमात्र का एक मात्र धर्मशास्त्र है। पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज द्वारा रचित अन्य धार्मिक साहित्य भी है जैसे आत्मानुभूति एवं जीवनादर्श, भजन किसका करें? एकलव्य का अंगूठा, द हिंदू, आर्य और सनातन, पुनर्जन्म हृदय,अंग क्यों फड़कतें हैं? क्या कहते हैं? शंका समाधान, योगशास्त्रीय प्राणायाम, पतंजलि योग दर्शन, अमृतवाणी पार्ट 1 से लेकर 14 तक अनुसुइया के परमहंस जी इत्यादि। अब एक नजर डालते हैं कि क्या है परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की विद्या जिसकी प्रसिद्धि सर्वविदित विश्वविदित है।
परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की विद्या:-— परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की विद्या गृहस्थ और विरक्त के लिए अलग-अलग हैं। नाम रुप और ब्रह्म विद्या। ब्रम्ह विद्या का उपदेश पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज पहाड़ पर केवल विरक्त महात्मा को उपदेश करते हैं। बाकी नाम और रूप गृहस्थों को उपदेशित किया जाता है नाम अर्थात दो ढाई अक्षर का ओम् राम अथवा शिव को जपा जाता है। ओमित्येकाक्षरं ब्रम्ह व्याहारन्मामनुस्मरन।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम।।।। अर्थात ऊं जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है उसका जप तथा मुझ एक परमात्मा का स्मरण, तत्वदर्शी महापुरुष के संरक्षण में ध्यान बस इतना ही करते करते सद्गुरु भगवान का रुप अपने आप सीसे की तरह हृदय में साफ दिखाई देने लगता है।
सुमरिय नाम रूप बिनु देखे। आवत हृदय सनेह बिसेषें।।
नाम के परिणाम में सद्गुरु भगवान का रूप स्पष्ट दिखाई देने लगता है। दो चार महीने ऐसा करने पर परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज साधक के हृदय से रथी हो जाते हैं गृहस्थ हो या विरक्त उन्हें चार प्रकार के बैखरी मध्यमा पश्यन्ती और परा के अनुभव से उठाने बैठाने सोवाने जगाने आदि पग पग पर संभालने लगते हैं। जन्म जन्मांतर परमात्मपर्यंत की दूरी तय करने तक साधक को पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज पकड़े रहते हैं।
भक्तों को परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज कैसे देते हैं आशीर्वाद?— भक्त जब परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज का दर्शन करते हैं फूल पत्ती मीठा प्रसाद फल-फूल जो भी उन्हें चढ़ाते हैं और अपना दुखड़ा सुनाते हैं तो पूज्य श्री स्वामी आर्त भक्त पर दृष्टिपात करते हैं उसी में उसका दुख हर लेते हैं फिर उसे कहते हैं जाओ धूना पर प्रणाम कर लो जो मांगना हो मांग लो वहीं रो गा लो अपना दुखड़ा सुना दो तुम्हारी श्रद्धा ही कृपा बनकर लौटेगी विभूति ले लो आदि आदि । इसके अतिरिक्त जो भी श्रद्वालु भक्तजन आर्त आश्रम में झाड़ूं बहारु साफ सफाई भंडारा गोशाला आदि में सेवा करते हैं तो उसे भी आशीर्वाद मिलता है।
प्राकृतिक पहाड़ों और नदियों से घिरा है श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ :— पुरातन ऐतिहासिक स्थली विजयपुर स्टेट का यह किला आज श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ के नाम से जगत प्रसिद्ध है। शक्तेषगढ़ आश्रम दक्षिण और पूर्व दिशा में पहाड़ों से घिरा है और आश्रम के पश्चिम में पहाड़ी नदी जौगढ़ बहती है और आश्रम के उत्तर में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा डैम बनाया जा रहा है जो पूर्णरूपेण प्राकृतिक सुंदरता से आह्लादित है।

 

परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज की उम्र 95+ होने के नाते नारद महाराज जी देखते हैं आश्रमीय व्यवस्था :— विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज अपनी स्थूल शरीर की यात्रा की लगभग 95 वर्ष फाल्गुन को पार कर गये हैं। वर्ष में दो महापर्व एक एकादशी और दूसरा गुरु पूर्णिमा आश्रम पर बड़े धूमधाम और श्रद्धा से मनाया जाता है इस अवसर पर पचासों लाख की भीड़ होती है पूरे भारत और विश्व के भक्त गण आते हैं, और पूज्य श्री स्वामी जी का हर स्टेट व विदेश में जहां जहां आश्रम है हर जगह से उनके शिष्य इन महापर्वों पर आते हैं । इन महापर्वों पर कई जिलों का शासन प्रशासन सुरक्षा को लेकर चाक चौबंद रहता है। इसके बावजूद आश्रमीय व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज के शिष्य नारद महाराज जी पर होती है। संत महात्मा वीआईपी नानवीआईपी , हर मज़हब के श्रद्धालु सभी के रहने खाने पीने भोजन प्रसाद सोने आदि की व्यवस्था नारद महाराज जी देखते हैं।
क्या कहती है यथार्थ गीता? क्या है गीतोक्त साधना ?:—- गीतोक्त साधना यथार्थ गीता में विस्तार से वर्णित है पर यहां हम संक्षेप में बता रहे हैं।
मनुष्य की केवल दो जाति है एक असुर और दूसरा देवता जिसके हृदय में दैवीय सम्पद कार्य करती है वह है देवता और जिसके हृदय में आसुरी संपद कार्य करती है वह है असुर। ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। साधना की विधि विशेष का नाम यज्ञ है। यज्ञ को कार्य रूप देना ही कर्म है। आराधना की एक ही विधि जिसका नाम कर्म है जिसको चार श्रेणियों में बांटा है, वही चार वर्ण है । यह एक ही साधक का ऊंचा-नीचा स्तर है न कि जाति। परमात्मपथ से च्युत होना, साधना में भ्रम उत्पन्न हो जाना वर्णसंकर है। दैवीय और आसुरी शक्तियों का संघर्ष ही युद्ध है ये अंतःकरण की दो प्रवृतियां हैं इन दोनों का मिटना परिणाम है। योगी के हृदय में ईश्वर द्वारा दी गई अनुभूति ही विराट दर्शन है। अवतार व्यक्ति के हृदय में होता है न कि बाहर। एक परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण ही धर्म है, उस प्रभु को पाने की नियत विधि का आचरण ही धर्माचरण है और जो उसे करता है वह अत्यंत पापी भी शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है। हरि अनंत हरि कथा अनंता ।कहहि सुनहि बहु विधि सब संता।। हरि अनंत हैं और उनकी कथा भी अनंत है उनके शरण सानिध्य में रहकर ही उनकी महिमा जानी जा सकती है। लिखने और पढ़ने से तो केवल उनके तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
NM News live
Author: NM News live

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