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सम्पादक देवेन्द्र राय

March 23, 2026 5:13 am

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जन्मजन्मान्तर के संस्कार ही पितर हैं जो हमें जन्म देते हैं — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद प्रणव

जन्मजन्मान्तर के संस्कार ही पितर हैं जो हमें जन्म देते हैं — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

“अतीत के संस्कार ही पितर हैं जो हमको जन्म देते हैं। जब हम परमात्मस्वरूप सद्गुरु के प्रति समर्पित होकर साधना करने लगते हैं, तब ये संस्कार तृप्त होने अर्थात कटने लगते हैं। यही पितरों का उद्धार है।”

पर्व/ त्योहार हमारे सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन को प्रतिबिंबित करने के साथ- साथ आध्यात्मिक जीवन को भी प्रतिबिंबित करते हैं। अनादिकालीन ऋषि-मुनियों महापुरुषों के शोध का परिणाम है अनेक दिव्य विभूतियां रिद्धियां- सिद्धियां। ऐसे ही पितृपक्ष एक ऐसा त्योहार है जो हमारे ऋषि मुनियों महापुरुषों द्वारा शोधित अनेक रिद्धि- सिद्धियों में एक संकल्प सिद्धि को दर्शाता है। उदाहरणार्थ ययाति के पुत्र पुरु ने अपने पिता को वैवाहिक जीवन भोगने के लिए संकल्प सिद्धि से अपनी जवानी दे दी। हुमायूं जवानी में ही गंभीर बीमारी से चारपाई पर मरणासन्न चपका पड़ा था। बुजुर्ग पिता बाबर चारपाई का सात बार परिक्रमा कर संकल्प किया कि हे परवरदिगार मेरे प्रिय पुत्र को बचा ले और उसके बदले मुझे ले ले। धीरे-धीरे हुमायूं स्वस्थ हो गया और बाबर बीमार होकर चारपाई पकड़ा और मर गया। इसलिए ये संस्कृत शास्त्र है पूर्वजों की सेवा करनी चाहिए इसी पिंडदान आदि की वजह से भारत में प्यार की गंगा बहती रहती है जिससे आने वाली पीढ़ियां माता-पिता की सेवा और सम्मान करती रहें। लेकिन दुर्भाग्यवश इसके उलट आज तमाम वृद्धा आश्रम खुले हैं हमारे शास्त्र मां और बाप को पृथ्वी और आकाश से बड़ा मानते हैं उनकी सेवा सर्वोपरी सेवा मानी जाती है यहां तक की भगवान राम भगवान परशुराम भीष्म पितामह भगवान श्रवण का नाम सर्वप्रथम वे अपने माता-पिता की सेवा के लिए जाने जाते हैं। लेकिन आज हम 21 वीं सदी में जी रहे हैं आज मां बाप की सेवा के संस्कार हमारे स्मृति पटल से धूमिल होते जा रहे हैं । तमाम वृद्धा आश्रम खुले गये हैं मां-बाप की पुण्य सेवा की ज़िम्मेदारी हम इन्हीं वृद्धा आश्रम पर छोड़ चुके हैं और जब साल में एक बार पितृपक्ष आता है तो हम उनके तर्पण के लिए पानी पिंडदान श्राद्ध न जाने क्या – क्या करते हैं जो हमारे सनातन संस्कृति के लिए बेमानी है। शरीर के लिए भोजन और आत्मा के लिए भजन की जरूरत होती है जो जीते जी मां-बाप के लिए हम ये दोनों काम नहीं कर पा रहे हैं । तो हमारा आपका जो जन्म होता है सांसारिक दृष्टिकोण से उसके कारण मां- बाप हैं लेकिन वास्तव में आध्यात्मिक जीवन में हम क्यों जन्म लेते हैं? उसके क्या कारण हैं? आध्यात्मिक जीवन में पितर कौन हैं? आइये इसके विषय में विस्तार से जानते हैं शास्त्रों का महा शास्त्र श्रीमद्भागवत गीता भाष्य धर्म शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता, मानवमात्र को धार्मिक भ्रांतियों के मकड़जाल से मुक्ति प्रदाता, विश्व के आईकान, धर्म के गूढ़तम रहस्यों से पर्दा उठाने वाले महान अवतार, विश्व गुरु, विश्व गौरव से सम्मानित समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष अनंत विभूषित करूणा निधान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की दिव्य वाणी से। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान ने आज मोक्षदायिनी ज्ञान गंगा केंद्र शक्तिषगढ़ में अपने उद्बोधन में बताया कि “*हमारे अतीत के संस्कार ही पितर हैं जो हमको जन्म देते हैं। जब हम परमात्मस्वरूप सद्गुरु के प्रति समर्पित होकर साधना करने लगते हैं, तब ये संस्कार तृप्त होने अर्थात कटने लगते हैं। यही पितरों का उद्धार है।”* आज पूज्य श्री गुरुदेव भगवान ने पितृपक्ष पिंडदान पिंडोदक क्रिया इत्यादि जैसे रूढ़िगत रहस्यों से पर्दा उठाते हुए उन्होंने संसार को आईना दिखाया। उन्होंने बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में बताया है कि– *वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोअ्पराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा — न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।* अर्थात जैसे मनुष्य जीर्ण-शीर्ण पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्रों को ग्रहण करता है ठीक वैसे ही यह जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को धारण करता है। उन्होंने बताया कि यह शरीर संस्कारों पर टिका है एक भी संस्कार बाकी है तो शरीर धारण करना पड़ता है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के गुरुदेव भगवान पिछले सात जन्मों से साधू थे पिछले जन्म में पार हो चले थे लेकिन एक कुतर्क मन में चल रहा था स्त्री और गांजा। इन्हीं दोनों संस्कारों की वजह से उन्हें पुनः सातवां जन्म प्राप्ति का जन्म (भवप्रत्यय) लेना पड़ा। बस थोड़े ही दिनों में उन्हें भगवान ने दिखा सुनाकर पूर्णत्व की प्राप्ति करा दी। तो इस प्रकार हमारे शरीरों का असल कारण संस्कार होते हैं संस्कारों के पीछे
शरीरों का समुद्र लहरा रहा है । ये संस्कार शरीरों को मारने से नहीं मरेंगे और न ही कटेंगे। ये तब कटेंगे जब हम समय के महापुरुष सद्गुरु की शरण जाकर उनकी टूटी-फूटी सेवा कर उनके दिशानिर्देश में यंत्रवत चलें तभी ये संस्कार कटेंगे अन्यथा नहीं। यह अंतःकरण की लड़ाई है । शरीर संस्कारों पर टिका है। एक भी संस्कार बाकी है जैसा संस्कार वैसा शरीर धारण करना पड़ेगा। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान ने बताया कि साधक के अंतिम संस्कार का मिट जाना , मन का अचल स्थिर ठहर जाना और शरीर निर्माण के कारण का अंत हो जाना एक ही साथ घटित होता है। इस निरोध के साथ ही भगवान शेष बचते हैं दर्शन स्थिति और प्रवेश पा जाने की स्थिति आ जाती है । शरीरांत शरीर नाशवान है ये शरीर छूटा तो दूसरा शरीर रिजर्व है वेटिंग में है। हमारे पुरखा किसी गड्ढे में नहीं पड़ें हैं कि हम पिंडदान करें ? ये शरीर छूटा दूसरा तैयार, फिर छूटा फिर तैयार, अंतिम संस्कार मिट गया तो शरीर निर्माण के कारण का अंत हो गया । अंतिम संस्कार मिटेगा कैसे? शरीर कारण का अंत कैसे होगा? भवप्रत्यय योगी की अवस्था कब आयेगी? ये सब सद्गुरु की शरण में रहकर भजन करने से होगा । जहां चिंतन में सुरत लग गई तो अंतिम संस्कार मिट गया । चित्त में उद्वेग कहां से पैदा होगा जब बीच में लेखनी में कुछ है ही नहीं । अचल स्थिति ठहर गया । *मन मरा माया मरी हंसा बेपरवाह। जाका कछु न चाहिए सोई सहंसाह ।।* की स्थिति आ जाती है। प्रकृति से संबंध टूट गया और परमात्मा से जुड़ गया तो प्रभू आप में दृष्टि बनकर खड़े हो जायेंगे सामने स्वयं नहीं समझोगे तो समझा लेगे । *सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।* स्थित मिल जाती है । यही है शरीरांत । ये अर्जुन ही कर सकता है श्रीकृष्ण रुपी सद्गुरु की कृपा से कर सकता है। अनुराग ही अर्जुन है । किसके प्रति अनुराग? एक परमात्मा के प्रति अनुराग प्रेम स्नेह। अनुरागी पथिक को ही ये युद्ध लड़ना है । ये क्षेत्र – क्षेत्रज्ञ का युद्ध है अंतःकरण की लड़ाई है । कुरुक्षेत्र में बाहर की लड़ाई के मुहाने पर सद्गुरु श्री कृष्ण के द्वारा अपने शिष्य अर्जुन को बताई गई ये बात संसार के हर अनुरागी पथिक के लिए है।, अंतिम संस्कार का मिट जाना कारण मिट जाना जहां कारण मिटा तहा सहज स्वरूप की अनुभूति हो जाती है यही है प्राप्ति । ये क्षेत्र – क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है । *ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।* भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि ये मेरा विशुद्ध अंश है किन्तु मन सहित इंद्रियों के व्यापार को लेकर जिस शरीर को त्याग कर नवीन शरीर धारण कर लेता है और *श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रशनं ध्राणमेव च। अधिष्ठायं मनश्चायं विषयानुपसेवते।।* यह कान आंख त्वचा इत्यादि मन सहित इंद्रियों के सहारे ही विषयों का सेवन करता है तो अगले जन्म में मन रुपी अधिष्ठाता विषयो में प्रवृत्त हों जाता है । पुनः शरीर धारण करते हुए पुनः विषयों में प्रवृत्त होते हुए वह एक न एक दिन संस्कारों की यात्रा पूरी कर लेता है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान ने बताया कि फिलहाल पिंडदान गलत नहीं है। हम अपने माता-पिता को श्रद्धा सुमन चढ़ाते हैं भेट करते हैं और संकल्प कर दोगे तो श्रद्धा से उन्हें मिल जायेगा। हमारे सनातन संस्कृति में संकल्प सिद्धि की विशेष मान्यता है। दादा गुरु कहा करें हो *जो इच्छा करिहों मनमाही। हरि प्रसाद कुछ दुर्लभ नाही।।* जो शास्त्र की बुनियाद पर धर्म होता है वह अक्षुण्ण होता है अजर-अमर होता है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान कहा करते हैं कि एक परमात्मा को पाने के लिए सुख शांति समृद्धि पाने के लिए धर्म विषयक भ्रम मिटाने के लिए यथार्थ गीता की चार बार आवृत्ति करें।

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Author: NM News live

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