संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
अबलाओं को न्याय दिलाने में खुद अबला बना हुआ है देश
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आंचल में दूध और आंखों में पानी।। ++++++++++
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास – रजत नग पग तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में
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घेरि छिपावहु विंध्य हिमालय
करहु सकल जल भीतर तुम लय।।
धोवहु भारत अपजस – पंका।
मेटहु भारत भूमि कलंका।।
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रोअहुं सब मिलिकै आवहु भारत भाई।
हा हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई

जिस देश में नारी सम्मान के लिए महाभारत हो गये हों, खून से कुरुक्षेत्र की मिट्टी लाल हो गयी हो, तत्समय का सर्वोपरि विद्वान , त्रिलोक विजयी, स्वर्ग की सीढ़ी का स्वप्न देखने वाले रावण का नारी सम्मान में बध कर दिया गया हो, द्रोपदी का चीरहरण करने वाले दुष्ट दुशासन का सीना फाड़ कर उसके रक्त से उस अपमानित द्रोपदी का केश धुलकर उसके बदले की आग बुझाई गयी हो, जिस जंघे पर बैठने के लिए दुर्योधन ने द्रौपदी को कहा उस जंघे को निर्दयता से तोड़ दिया गया हो, उस देश में आज नारी महज अबला बनकर रह गई हैं। आज इस लोकतांत्रिक देश में अबलाओं के साथ गैंगरेप किया जाता है उनको बोटी-बोटी काटकर फ्रीज में रखा जाता है उनको नंगा घुमाया जाता है उन्हें गैंगरेप के बाद जला दिया जाता है उनका अंग भंग किया जाता है । देश ऐसी जघन्य व वीभत्स घटनाओं का सुनने व देखने का आदी हो गया है और अबलाएं सियासत की भेंट चढ़ जाती हैं। केवल कभी कभार एकाध आदर्श लाइनें सियासत की गलियारों से निकलती हैं
और दीवालों पर लिखी हुई दिख जाती हैं जैसे — *बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ* *महिला सशक्तिकरण*, दरिंदों के लिए कड़े क़ानून आदि । पर हम जिस अस्मत को बचाने की बात कर रहे हैं, देश में महिलाओं का सम्मान बढ़ाने की बात कर रहे हैं हम केवल बातें ही कर रहे हैं पर धरातल पर तो ये कन्फर्म है कि न तो सम्मान बच रहा है और न ही अस्मत केवल हम आदर्श लाइनों के भरोसे हैं न कि किसी ठोस कदम या कोई जीवटता या कोई कड़ा कदम के भरोसे। अक्सर हमारा देश अबलाओं को न्याय दिलाने में खुद अबला बना हुआ नजर आता है। जैसे वीरांगना फूलन देवी उनके साथ गैंगरेप हुआ कई स्टेप में हुआ लेकिन शासन प्रशासन मौन रहा दरिंदों को शासन प्रशासन का प्रश्रय मिलता रहा लेकिन वीरांगना फूलन देवी को न तो कानून न्याय दिला सका और न ही सियासत। अंततः फूलन को खुद न्याय की लड़ाई लड़नी पड़ी और उसने ऐसा जवाब दिया उन दरिंदों को कि पूरे विश्व के लिए उन अबलाओं के लिए आदर्श बन गई जो अस्मत लुट जाने के बाद जिंदगी से हारकर या तो आत्महत्या कर लेती हैं या तो अपने आपको उन परिस्थितियों के सामने आत्मसमर्पण कर देती या समाज में जिंदा लाश बनकर जीती हैं। वीरांगना फूलन देवी को न्याय दिलाने में हमारा देश अबला बना रहा। मणिपुर में महीनों दंगे चले अबलाओं को नग्न घुमाया गया लेकिन यहां भी अबलाओं का अस्मत सियासत की भेंट चढ़ गया। पहलवान बेटियां जो देश के सम्मान को बढ़ाने के लिए जी जान लगा देती हैं उनको नहीं छोड़ा गया। उनको न्याय पाने के लिए धरना प्रदर्शन करना पड़ा और हद तब हो गई कि उन्हें सियासत के इशारे पर कानून के रक्षकों ने सड़कों पर बाल पकड़ कर घसीटा । एक तरफ उन्हें सड़कों पर घसीटा जा रहा था पहलवान बेटियां चीख चिल्ला रही थी तो दूसरी तरफ आरोपी नई संसद के उद्घाटन में मुस्कुरा रहा था। पहलवान बेटियां को मिलने वाला न्याय भी सियासत के भेंट चढ़ गया । ताजा उदाहरण बंगाल में डाक्टर रेप मर्डर का ले लें। दरिंदे अभी तक नहीं पकड़े गए सियासत तेज हो चुकी है। पूरा देश डाक्टर लेडी को न्याय दिलाने के लिए आक्रोशित हो रहा है लेकिन दरिंदों को बचाने में सियासत की काट छांट, तंज पैंतरा पूरा देश देख रहा है । आरुषि हत्या कांड, नेहा गैंगरेप जौनपुर, कन्नौज , हाथरस आदि अभी हाल ही में अयोध्या, एक लंबी फेहरिस्त अबलाओं की है जिनकी आत्माएं तड़प रही होंगी। लेकिन हमारा देश और सियासत अंधे धृतराष्ट्र की भूमिका में नजर आ रहा है। जैसे द्रोपदी चीर हरण में धृतराष्ट्र देख तो नहीं रहा था पर चीखें तो सुन ही रहा था पर हमारा देश और सियासत देख भी रहा है और सुन भी रहा है पर आंखों में पट्टी बांधे हुए है कानों में रुई ठुंसे हुए है। कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है कोई भीम नहीं दिखाई दे रहा है कि उन दरिंदों का जंघा तोड़े उनका सीना फाड़े या कीचक जैसी सजा दे बल्कि उन दरिंदों की रक्षा में सियासत खड़ी दिखाई देती है। बंगाल में दरिंदों के पक्ष में सियासत सबूत मिटा रही है अयोध्या गैंगरेप में विपक्ष पूर्णतः दरिंदों का पक्ष ले रहा था। मणिपुर दंगों में और पहलवान बेटियों के मामले में सत्ता पक्ष महीनों तक अंधे धृतराष्ट्र की तरह *मौनं स्वीकृति लक्षणं* के रोल में रहा। अक्सर देखा गया है कि पीड़ित अबलाओं को न्याय दिलाने में हमेशा धरना प्रदर्शन आमरण-अनशन का सहारा लिया जाता है लेकिन फिर भी यथोचित न्याय नहीं मिला। अबलाओं को न्याय दिलाने में सियासत देश को इतना निराश कर दिया है कि देश को सियासत से भरोसा ही उठ गया है बल्कि देश पहलवान बेटियों मणिपुर बंगाल की लेडी डाक्टर गैंगरेप में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की ओर एकमात्र आश की निगाहें गड़ाये रहा। अक्सर देखा जा रहा है कि अबलाओं के मामलों में हम महज कुछेक आदर्श लाइनों पर टिके हैं यही हमने सिद्धांत बना लिया है जबकि व्यवहार में फिसड्डी साबित हो रहे हैं।
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास – रजत नग पगतल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में
वीरांगना फूलन देवी के मामलों में तो सब चुप रहे न सियासत उफ की न तो कोर्ट दरिंदों ने उसको बागी बनने को मजबूर कर दिया। वीरांगना फूलन न्याय के लिए चंबल का सहारा लिया उन्हें मजबूरन हथियार उठाना पड़ा और उनके अंदर सुलग रही बदले की चिनगारी शोला बन गई और उन शोलों ने उन दरिंदों को मौत के घाट उतार दिया । इस घटना से पूरी दुनिया हिल गयी अंततः फूलन ने अपने आपको कानून के हवाले कर दिया । मुलायम सिंह उनके त्याग और बलिदान की कीमत को समझा उनको जेल से निकाल कर उन्हें सांसद बना कर पीड़ित अबलाओं के सामने एक नजीर पेश किया और अंत में सियासत ने ही उनकी हत्या करवा दी। हद तो तब हो गई शेर सिंह राणा जिसने वीरांगना फूलन देवी की हत्या की उसी को भाजपाइयों ने स्टार प्रचारक बना दिया। ये है हिंदुस्तान की सियासत का खेल, दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की तस्वीर, खद्दर धारियों की करतूतें । एक दरिंदा वो हैं जो अबलाओं का अस्मत इज्जत आबरू लूटते हैं उनको जला देते हैं उनके साथ गैंगरेप करते हैं उनका अंग-भंग करते हैं तो दूसरा दरिंदा सियासत है जो उन्हें बचाती है खद्दर धारी हैं जो सफेद पोश अपराधी हैं जिन पर सैकड़ों मुकदमें दर्ज हैं। इन कचड़ों से कैसे देश निपटेगा? नौकरी के लिए कानून है कि कोई एफआईआर न हो थानों से
वेरीफिकेशन होता है लेकिन खद्दर धारियों जिन पर सैकड़ों मुकदमें दर्ज हैं उनका कोई वेरीफिकेशन नहीं होता और यही लोग जाकर विधानसभा और संसद में उन दरिंदों को बचाते हैं जो अबलाओं के इज़्ज़त की धज्जियां उड़ाते हैं। फिलहाल 21 वीं सदी के भारत का लोकतंत्र, संविधान, कानून अबलाओं को न्याय दिलाने में खुद अबला बना हुआ है इसकी मुख्य वजह है कि हम सामंती सोच से निकल नहीं पा रहे हैं। अबलाओं को न्याय दिलाने में पक्ष विपक्ष, पार्टी बंदी, सियासती मकड़जाल आड़े आ रहा है। जो लोकतांत्रिक देश के लिए अभिषाप है।






