वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
पिछड़ी से नाम खारिज करो मझवार आरक्षण जारी करो

“पिछड़ी से नाम खारिज करो” “मझवार आरक्षण जारी करो” केवट मल्लाह बिंद रायकवार बाथम गोड़िया, मांझी, आवाज दो हम अनुसूचित के हकदार हैं और डाक्टर संजय निषाद के साथ हैं जैसे अनगिनत स्लोगन के साथ निषाद समाज आरक्षण के लिए आवाज बुलंद करता रहा है। विगत सरकारें निषाद आरक्षण पर ध्यान नहीं दिया जिसके परिणामस्वरूप वे वेंटिलेटर पर हैं। अब निषाद समाज 2014, से लगातार 2017, 2019, 2022, 2024 के चुनावी सफर में भाजपा के साथ कंधों में कंधा मिलाकर खड़ा है। आरक्षण की आस में डाक्टर संजय निषाद के नेतृत्व में पूरे आबादी का 18 प्रतिशत निषाद समाज भाजपा को सत्ता के सुख में गोते लगवा रहा है। दिन रात डाक्टर संजय निषाद निषाद समाज को एक ही आश्वासन देते रहे कि भाजपा हमें मझवार/ तुरैया इत्यादि को परिभाषित करके अनुसूचित जाति का दर्जा देगी जिससे निषाद समाज की हर क्षेत्र में पर्याप्त भागीदारी होगी व राजनीतिक, शैक्षिक ,आर्थिक उन्नयन व निषाद समाज अपने लिविंग स्टैंडर्ड को सुधार सकेंगे। एकमात्र आरक्षण की उम्मीद में निषाद समाज भाजपा के सियासी उथल-पुथल में हमेशा भाजपा के साथ रहा । लेकिन अभी तक निषाद समाज को आरक्षण नहीं मिला। कहीं निषाद समाज का सब्र टूटा तो भाजपा का भी वही हश्र होगा जो सपा बसपा और कांग्रेस का हुआ है। अभी हाल ही में निषाद पार्टी के सुप्रीमो व कैबिनेट मंत्री डाक्टर संजय निषाद ने विधानसभा में योगी सरकार को चेतावनी दे दी कि भाजपा हमें
आरक्षण दे मगरमच्छ न बने अन्यथा वही हश्र होगा जो सपा बसपा कांग्रेस का हुआ है। 2021 में रमाबाई अंबेडकर मैदान में बीजेपी और निषाद पार्टी की संयुक्त रैली के दौरान अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में आरक्षण न मिलने से निषादों ने कुर्सियां तोड़ दी थी। आरक्षण नहीं तो वोट नहीं के नारे भी लगे थे। निषादों को उम्मीद थी कि वे आरक्षण के संबंध में घोषणा करेंगे लेकिन जब आरक्षण घोषणा नहीं हुआ तो वीवीआईपी फ्लीट जाने के बाद निषादों का सब्र टूटा तो उन्होंने गुस्से में कुर्सियां ही तोड़ डाली। हालांकि कि बाद में स्थिति को संभाला गया। सामने 2027 विधानसभा चुनाव है। आरक्षण के नाम पर भाजपा अभी तक निषादों को 2014 से ही अपने 12 वर्षीय सफलतम सियासी सफर में निषादों को आरक्षण के नाम पर केवल झुनझुना ही दिया है। जबकि इस बीच डाक्टर संजय निषाद ने यह बार- बार कहा है कि हमने 10 प्रतिशत आर्थिक रुप से पिछड़े सामान्य वर्ग के आरक्षण का विरोध नहीं किया हमने इस आरक्षण में भाजपा के साथ खड़े रहे यदि 72 घंटे के अंदर सामान्य वर्ग को आरक्षण मिल सकता है तो 2014 के भाजपा के सफलतम सियासी सफर में निषाद को 12 वर्ष से आरक्षण देने में देरी क्यों हो रही है? निषाद समाज जब-तक सपा-बसपा कांग्रेस के साथ था तो सपा-बसपा कांग्रेस की सरकार बनती थी और आज भाजपा के साथ है तो भाजपा की सरकार बन रही है। 2027 का चुनाव सर पर है सपा-बसपा कांग्रेस निषादों को अपनी तरफ़ खींचने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाएंगे। और यदि 2027 विधानसभा चुनाव तक मझवार/ तुरैया इत्यादि को परिभाषित करके निषादों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया गया और कही सपा-बसपा कांग्रेस निषादों को अपनी तरफ़ मोडने में कामयाब रहे तो फिर भाजपा की नैया उत्तर प्रदेश में पलट सकती है। चूंकि 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद 2029 में लोकसभा चुनाव है दिल्ली की सियासी कोरिडोर लखनऊ से होकर जाता है चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार का विकल्प हो सकता है कि यूपी का ही कोई सपा-बसपा का सियासी पहलवान ले ले। इसलिए अभी सबेरा है केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा सरकार है भाजपा निषादों को आरक्षण देकर फिर अपने 2027 विधान सभा चुनाव और 2029 लोकसभा के चुनाव पर अपने वोटबैंक निषादों के सहारे जीत की पक्की मोहर लगा सकता है। अन्यथा डाक्टर संजय निषाद द्वारा विधानसभा में भाजपा को दी गई चेतावनी आगामी विधानसभा व लोकसभा चुनाव में कहीं निषाद समाज भाजपा की नांव को पलटा तो फिर भाजपा अपने 12 वर्षों से भी अधिक लंबी अवधि के सियासी वनवास की कोमा में चला जाएगा।






