मंदसौर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
ॐ श्री परमहंस आश्रम परोनिया में यथार्थ गीता पाठ सुंदरकांड व भण्डारे का आयोजन
श्री परमहंस आश्रम परोनिया में प्रथम दिन यथार्थ गीता का पाठ एवं प्रसाद वितरण हुआ। दूसरे दिन 1 मार्च 2026 को बाबुलदा की संगीत मण्डली द्वारा संगीतमय सुंदरकांड का एवं भजन कीर्तन का आयोजन हर्ष और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। ततपश्चात सत्संग एवं प्रवचन परमहंस आश्रम परोनिया के श्री रामरक्षा नन्द जी महाराज द्वारा किया गया । प्रवचन के दौरान उन्होंने बताया कि यथार्थ गीता के प्रणेता विश्व गुरु परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की असीम कृपा से परमहंस आश्रम परोनिया में यह धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ है। जिसमें भारी संख्या में भक्तजन द्वारा हर्षोल्लास के साथ भाग लिया एवं सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। श्री राम रक्षा नंद जी महाराज द्वारा अमृतमय सत्संग सुनाया गया । उन्होंने अपने प्रवचन में बताया कि मानव मात्र का धर्मशास्त्र यथार्थ गीता है। यह गीत मत मजहब संप्रदाय संगठन आदि से ऊपर उठकर है। सृष्टि का प्रथम सत्य का उपदेश भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया जो वेद उपनिषद ब्रह्म सूत्र भागवत महाभारत सब का सार है। मात्र 700 श्लोकी गीता का यह ग्रंथ है। श्रीकृष्णकालीन महर्षि वेदव्यास से पूर्व कोई भी शास्त्र पुस्तक के रूप में उपलब्ध नहीं था। श्रुत ज्ञान की इस परम्परा को लेखन से जोड़ते हुए उन्होंने चार वेद, ब्रह्मसूत्र, महाभारत, भागवत एवं गीता-जैसे ग्रन्थों में पूर्वसंचित भौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञानराशि को संकलित कर अन्त में स्वयं ही निर्णय दिया कि-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता।।
गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, जो पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से निःसृत वाणी है; फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता? मानव सृष्टि के आदि में भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निःसृत अविनाशी योग अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता, जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद और उपनिषद् हैं, विस्मृति आ जाने पर उसी आदिशास्त्र को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुनः प्रकाशित किया, जिसकी यथावत् व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ है।
इस प्रकार से हम सब का आध्यात्मिक धर्म ग्रंथ यथार्थ गीता है सभी को इस धर्मशास्त्र यथार्थ गीता को पढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि जीव का उद्धार सिर्फ सुचारू रूप से जीवन यापन भर कर लेने से नहीं बल्कि मोक्ष मार्ग से है। सभी मानव को नित्य यथार्थ गीता का अध्ययन करना चाहिए। जिससे मन मस्तिष्क में भरा हुआ धार्मिक विकृतियों का कचरा निकल जाएगा और एक परमात्मा की भजन साधना विधि विशेष की जानकारी हो जाएगी। यथार्थ गीता ऊँच- नीच छुआछूत भेदभाव अमीर गरीब स्त्री पुरुष वनवासी आदि जैसी घृणित भावना नहीं रखती है। घर-घर यथार्थ गीता का पाठ होना चाहिए। इस प्रकार सभी भक्तों ने एकाग्र मन से सत्संग को सुना और भोजन भंडारा ग्रहण कर अपने को धन्य माना हर्ष और उल्लास और प्रसन्नता के साथ-साथ धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ।





