वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
गीता जयंती:– गीता दुनिया का एकमात्र वैज्ञानिक धर्म शास्त्र है– स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती समा:।शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोअ्भिजायते।।
विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज कहते हैं कि गीता दुनिया का एकमात्र ऐसा धर्म शास्त्र है जो पूर्णतया वैज्ञानिक है। कारण कि यह अपौरुषेय वाणी है जो आज से लगभग 5200 वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच होने वाले महाभारत युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को जो उपदेश दिया था वही गीता है जो महाभारत का एक खंड काव्य है और जिसकी यथावत व्याख्या आज 21 वीं सदी में यथार्थ गीता के रूप में पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज द्वारा की गयी है। पूज्य गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज जोर देकर कहते हैं कि श्री कृष्ण कालीन महर्षि वेदव्यास से पूर्व कोई भी शास्त्र पुस्तक के रूप में मौजूद नहीं था , श्रुति ज्ञान की परंपरा को तोड़ते हुए उन्होंने चार वेद छः शास्त्र अट्ठारह पुराणों ब्रम्हसूत्र भागवत महाभारत एवं गीता जैसे ग्रंथों में पूर्व संचित भौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान राशि को संकलित कर अंत में महाभारत के भीष्मपर्व में स्वयं ही निर्णय दिया कि —
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै शास्त्रसंग्रहै।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता।।
अर्थात गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, जो पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से नि:सृत वाणी है। फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की कोई आवश्यकता नहीं है। पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि मानव- सृष्टि के आदि में भगवान श्री कृष्ण के श्रीमुख से नि:सृत अविनाशी योग अर्थात श्रीमद्भागवत गीता, जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद और उपनिषद है, विस्मृति आ जाने पर उसी आदि शास्त्र को भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुनः प्रकाशित किया, जिसकी यथावत व्याख्या “यथार्थ गीता” है। गीता का सार इस श्लोक से प्रकट होता है —
एकं शास्त्र देवकीपुत्र गीतम्
एको देवो देवकीपुत्र एव।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।।-गीता महात्म्य।अर्थात एक ही शास्त्र है जो देवकी पुत्र भगवान ने श्रीमुख से गायन किया -गीता। एक ही प्राप्त करने योग्य देव है । उस गायन में जो सत्य बताया – आत्मा। सिवाय आत्मा के कुछ भी शास्वत नहीं है। उस गायन में उन महायोगेश्वर ने क्या जपने को कहा। ओम्। अर्जुन। ओम् अक्षय परमात्मा का नाम है, उसका जप कर और ध्यान मेरा धर। एक ही कर्म है गीता में वर्णित परमदेव एक परमात्मा की सेवा। उन्हें श्रद्धा से अपने हृदय में धारण करें। अस्तु, आरंभ से ही गीता आपका शास्त्र रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के हजारों वर्ष पश्चात परवर्ती जिन महापुरुषों ने एक ईश्वर को सत्य बताया, गीता के ही संदेश वाहक है। ईश्वर से ही लौकिक एवं पारलौकिक सुखों की कामना, ईश्वर से डरना, अन्य किसी को ईश्वर न मानना – यहां तक तो सभी महापुरुषों ने बताया; किंतु ईश्वरीय साधना, ईश्वर तक की दूरी तय करना – यह केवल गीता में ही सांगोपांग क्रमबद्ध सुरक्षित है। गीता से सुख -शांति तो मिलती ही है, यह अक्षय अनामय पद भी देती है। देखिए श्रीमद्भागवत गीता की टीका – “यथार्थ गीता”। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादर है फिर भी यह किसी मजहब या संप्रदाय का साहित्य नहीं बन सकी; क्यों कि संप्रदाय किसी न किसी रुढ़ि से जकड़े है। भारत में प्रकट हुई गीता विश्व – मनीषा की धरोहर है, अतः इसे राष्ट्रीय शास्त्र का मान देकर ऊंच -नीच, भेद -भाव तथा कलह है- परंपरा से पीड़ित विश्व की जनता को शांति देने का प्रयास करें।
*गीता का ही यथार्थ भाष्य है यथार्थ गीता* — चित्रकूट के घने जंगलों में हिंसक पशुओं के बीच समय के महापुरुष परमहंस स्वामी परमानंद जी महाराज के शरण शानिध्य में भगवान अत्रि और माता अनुसुइया की तपोभूमि में तपस्यारत परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज को अकस्मात गीता लिखने को आकाशवाणी हुई। भगवान श्री कृष्ण उन्हें अनुभव में बताये कि आप संसार में तांडव (हृदय परिवर्तन) कर सकते हैं आप में बहुत भावुकता है पूज्य श्री स्वामी जी ने कहा कि भावुकता जायेगी कैसे? तो उन्होंने कहा आपको गीता लिखना है। पूज्य श्री सोचे जैसे जन्म जन्मांतर के संस्कार कठिन तपस्या से कट गये वैसे इसे भी काट देंगे फिर कठिन तपस्या में लग गए लेकिन ईश्वरीय इच्छा पुनः आकाशवाणी हुई गीता लिखना ही पड़ेगा। पूज्य श्री स्वामी जी से आखिरकार भगवान ने गीता लिखवा ही ली। ईश्वरीय आदेश का पालन करते हुए पूज्य श्री ने गीता लिखी और आज यही गीता संसार के समक्ष यथार्थ गीता के रुप में विद्यमान है। पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि ईश्वर प्रदत्त यथार्थ गीता एक अनमोल धरोहर है इसे जाति पाति मज़हब से ऊपर उठकर संसार को धारण करना चाहिए । यह मानव मात्र का एकमात्र कालजयी धर्म शास्त्र है। जाति धर्म शास्त्र ज्ञान यज्ञ कर्म आदि की वास्तविकता को समझने के लिए यथार्थ गीता को पढ़ें और उसके बताए मार्ग पर चलें।






