वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
ईश्वरीय प्रेम ही प्रहलाद है, नर से नरसिंह तब, जब अविद्यारूपी होलिका दहन व नारद रुपी सद्गुरु की छाया — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
होली अविद्या फूंकि के, हो गए गुप्ता नंद।
समझे कोई सुघड़ विवेकी क्या समझे मतिमंद ।।

विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष अनंत विभूषित, करुणा निधान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने आज होलिका पर्व पर होलिका दहन की आध्यात्मिक व्याख्या की। उन्होंने अपने उद्घोष में बताया कि होली पर्व संसार के लिए एक सीख है, नजीर है आध्यात्मिक दहलीज की एक झांकी है। ओम उद्घोष परम तत्व का बीजारोपण है। महापर्व/ त्योहार किसी भी देश की संस्कृति का दर्शन होता है । ऐसे में होली पर्व जो विश्व गुरु भारत का नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है जो गुरु- शिष्य परंपरा के पवित्रतम बंधन को सुवासित करता है। सद्गुरु नारद और शिष्य प्रहलाद के माध्यम से संसार और मानवता के, असत्य पर सत्य की विजय, अधिद्या पर विद्या की विजय, व विजातीय प्रवृतियों पर सजातीय प्रवृतियों की विजय का संखनाद करती है। राम नाम नर केसरी कनक कसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दल सुरसाल।।
अब प्रश्न उठता है कि नरसिंह क्या है? सद्गुरु का नाम ही नरसिंह है, जो भगवान, परमात्मा, व महापुरुष का पर्यायवाची हैं।- ओमित्येकाक्षरं ब्रम्ह व्याहरन्मामनुस्मरन।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम।।
कथानक के अनुसार जय और विजय जो क्रमशः नाम और रूप के द्योतक है, सनकादिक ऋषियों से श्रापित हो गये, पदच्युत हो गये, श्रेय (परमात्मपथ) से च्युत हो गये, गिर गये।
विरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि।
जय पाइय सो हरि भगति कहे खगेश विचारि।।
जो नाम में थे प्रकृति के अनुकूल हो गये । मन- बुद्धि- चित्त -अहंकार ‘चतुष्पद’ में विकार आ गया। जय और विजय च्युत हो कर हिरण्याक्ष (प्रकृतिमयी दृष्टि) और हिरण्यकशिपु हो गये । ‘हिरण्याक्ष’ अर्थात गर्भमयी विधाता ही सृष्टि है हमारी दृष्टि सृष्टिमयी है हिरण्य गर्भा प्रकृति ही हिरण्याक्ष है जो प्रारंभ में यही अच्छी लगती है । जो दृष्टि भगवान में विद्या में सजातीय प्रवृतियों में रहनी चाहिये वह दृष्टि संसारोन्मुख अविद्या, विजातीय हो जाती है उदाहरणार्थ भगवान एक कल्पना है बकवास है कोरी कल्पना है जाओ खाओ पीओ मौज करो और जो कुछ कमा खा लिया तो मैं ही हूं भगवान ‘* *एको अहं द्वितीयो नास्ति*’ वह इतना नीचे गिर जाता है, ठीक ऐसे ही हिरण्यकश्यप भी कर रहा था। इसलिए भगवान तक नहीं पहुंच पाता यही है श्रेय (परमात्मपथ) से गिर जाना।
भरत बिबेक बराहं बिसाला। अनायास उघरी तेहि काला।।
ब्रम्ह के राह में चलना अर्थात संसार से भगवान की ओर चलना है । यही है संसारोन्मुख प्रकृति को समुद्र में डुबाना। जब चलते हैं तपस्या करने तो काया की धुरी को धारण करना ही कयाधू है। जब हम भगवान के, काया माने कश्यप, जो स्वस्वरूप की धुरी को धारण करते हैं तो उसके अंदर में भगवान के प्रति जो प्रेम की भावना है तभी तो भगवान का सुमिरन चिंतन करेगा यही है प्रहलाद। प्रेम ही प्रहलाद है ह्दय में भगवान के लिए प्रेम जाग्रति हो गया। नाभि कमल की स्थिति वाले पकड़ वाले सद्गुरु होते हैं वही हैं नारद। इंद्रियों के दैवीय सम्पद पर जब मन का आधिपत्य हो जाता है तो वही है इंद्र । और जब साधन भजन की अवस्था आ जाती है तो नाद रंध्र स नारद: तब नाभि धुन की आवाज पकड़ में आती है । नाभि धुन की आवाज कभी नष्ट नहीं होती है। नभ कहते हैं आकाश को आकाशीय शब्द जिसको उपलब्ध है आकाशवाणी के सहारे चलने वाले महापुरुष ही सद्गुरु होते हैं । ऐसे प्रहलाद जैसे साधक उनके द्वारा निर्देशित होते हैं । विश्व में अणु रूप में व्याप्त है विष्णु उनकी भक्ति ज्यों ही ह्दय में जाग्रति हुई तो प्रकृति में ऐसी कोई ताकत नहीं है कि उसे मिटा दे। तो प्रहलाद को अग्नि में जलाया गया। माया त्रय तापों में जलाती है काम रुपी मतवाले हाथियों से कुचलवाती है प्रकृति के अनंत संशय रूपी सर्प के बीच में पटकती है यह माया प्रकृति के भयावह बीहड़ में ढकेल देती है यही है माया का पहाड़ से गिराना । विषय रूपी अग्नि में जलाती है तो *गृह कारज नाना जंजाला ।ते अति दुर्गम शैल विशाला* ।। सागर में फेंकना तो संसार ही सागर है । माया ही पहाड़ है,कामना ही हाथी है, संशय से युक्त अंतःकरण शर्पों से भरी पोटली है और अविद्या रूपी होली है । असत्य को सत्य मान लेना ही अविद्या है लेकिन यदि भक्त भगवान के आश्रित हो तो त्रय ताप तो माया के अंदर ही तक होता है भगवान में नहीं होता । तो जो भगवान के आश्रित होता है तो वह सुरक्षित होता है और अविद्या रूपी होलिका खुद दग्ध हो जाती है, ईश्वरीय प्रेम में आह्लादित प्रहलाद बच जाता है। 
होली अविद्या फूंकि के हो गये गुप्तानंद । समझे कोई सुघड़ विवेकी क्या समझे मतिमंद।। अविद्या रूपी होली को फूंककर स्वयं आनंद का स्वरूप बन जाते हैं जो गुप्त है आनंद है अलख है उसी के स्वरूप में लीन हो जाते हैं। इसको कोई सुलझा हुआ विवेकी ही समझ पाता है, बुद्धिहीन नहीं। *निरंजन माला घट में फिरै दिन रात* इस माला को श्वास से जपा जाता है तो श्वास ही स्तंभ है । पहले इसमें त्रय तापों की विषय रुपी लहरें उठा करती थी। हिरण्यकश्यप (प्रकृतिमयी दृष्टि) जलाया करता था। त्रय तापों की ज्वाला दग्ध करती रहती है। होलिका के जल जाने से दैवीय सम्पद और आसुरी संपदा खत्म हो जाती है । अंतःकरण में विचार अच्छे बुरे दग्ध हो जाते हैं।। कर्म सदा के लिए दग्ध हो जाते हैं, तो वह त्रय तापों की ज्वाला विषयानल खत्म हो जाता है। श्वास खम्भे की तरह स्थायित्व ले लेता है। श्वास संकल्प- विकल्प से शून्य हो जाता है न भला उद्वेग उठता है और न बुरा। भगवान के मिलन का नाम योग है बुआ होलिका के जल जाने पर यज्ञ कर्मे समारंभा कामसंकल्पवर्जिता: । ज्ञानाग्नि दग्धकर्माणं तमाहृपंडितंबुधा्।।
अर्जुन जिस पुरुष के द्वारा पूर्णतः से आरंभ की हुई क्रिया क्रमशः उत्थान होते-होते इतनी सूक्ष्म हो गयी कि वासना और मन से संकल्प विकल्प से ऊपर उठ जाती है जिसका कर्म संस्कार ज्ञानाग्नि में सदा के लिए भस्म हो जाते हैं उसे ही बोधस्वरूप महापुरुषों ने पंडित कहकर संबोधित किया है। ज्ञानाग्नि का संचार हुआ तो चित्त इतना सूक्ष्म हो जाती है जितना बारीक चींटी वह श्वास के साथ चलने लगती है ओम् ओम ओम की अनहद धुन चलने लगती है बीच में कोई वाधा नहीं । संकल्प विकल्प से शून्य हो जाती है श्वास खंभे की तरह खड़ी हो जाती है तैलधारावत यह वृत्ति इस श्वास में प्रवाहित हो जाती है । श्वास स्थिर हो गई यही स्थिर स्वर ही स्तंभ है । उस समय चित्त इतनी संयमित हो गयी जैसे जीते हुए योगी का चित्त। जीते हुए चित्त को ही चींटी कहते हैं। श्वास रूपी स्तम्भ में परमात्मा के प्रेम में आह्लादित प्रहलाद का मन एकाग्रचित्त हो गया। प्रेम में आह्लादित प्रहलाद जब इसमें स्पर्श कर लेता है तहां वह अब तक जो नर था अब वह नर से सिंह हो गया, नरसिंह हो गया, भगवान नारायण का स्वरूप उसमें प्रकट हो जाते हैं ।हिरण्यकश्यप प्रकृति मयी दृष्टि सदा के लिए शांत हो जाती है । हिरण्यकश्यप पकड़ में आ गया। सोइ जानहि जेहि देइ जनाई । *जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई।। भगवान का आलोक जहां फैला तो प्रकृति पुरुषत्व में परिवर्तित हो गयी । प्रकृति का अंधकार ईश्वरीय प्रकाश में विलीन हो गया। अब न दिन है न रात न अस्त्र है न शस्त्र है विधाता की सृष्टि से परे का एक स्वरूप को जीते जी प्राप्त कर लेना। प्रहलाद की जै- जै कार हो गयी । पर अर्थात परमात्मा के लिए आह्लादित होना पृथ्वी से परे, माया से परे । भवति ‘भव’ माने प्रकृति ‘इति’ माने खत्म, तो हमारी आपकी जो प्रकृति होती है षडविकारो में काम- क्रोध- लोभ- मोह- मद -मत्सर, विजातीय परिवार आदि में तो इनसे हटकर जब हम आप भजन साधना करते हैं तो प्रकृति को छोड़ना पड़ता है । पहले धीरे- धीरे अभ्यास करते- करते भजन की ओर मन लगने लगता है। अब जो ‘महापुरुष’ हो जाते हैं भगवान माने संचालन- कर्ता हो जाते है। ‘भग’ माने प्रकृति ‘इति’ माने खत्म तब हमारी प्रवृत्ति साधना करते- करते खत्म हो जाती है क्योंकि प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं । वही प्रवृत्ति जैसे-
उल्टा नाम जपा जग जाना।वाल्मीकि हुए ब्रम्ह समाना। वाल्मीकि की प्रकृति जो क्रूर थी रत्नाकर से बदलाव हो गया, । धीरे-धीरे प्रकृति चेंज हो कर लक्ष्य की ओर उन्मुख हो गयी। रत्नाकर से वाल्मीकि हो गये। वैसे ही महापुरुष की जो प्रकृति होती है स्वरुपस्थ महापुरूष आत्मरत- आत्मतृप्ति- आत्मसंतुष्टि जो महापुरुष होते हैं वे अपने स्वरूप में वरतते है। उनके अंदर, विवेक, वैराग्य, धारणा, ध्यान, समाधि हमेशा ईष्टोमुखी ही उनकी वृत्ति रहेगी । संसार में व्यवहार करें जो कुछ भी करे महापुरुष वाली योग्यता सजा सजाया विद्यमान रहता है । होली पर्व धर्म- प्राण भारत में वसंत ऋतु में मनाई जाती है । वस + अंत वासनाओं का अंत ही वसंत है। लोग होलिका दहन करते हैं फाल्गुन में नव वर्ष की शुरुआत होती है ।
वसन्त ऋतु फाल्गुन में आवे।
खेल यह प्रारब्ध रचवावे।।
इत्र गुलाल ज्ञान रोरी।
खेलते भर- भर के झोरी।।
पूज्य श्री स्वामी गुरुदेव भगवान कहते हैं कि फाल्गुन अर्थात विशेष फलदायक गुण वसन्त ऋतु अर्थात स्थायी मस्ती। सांसारिक ऋतुएं तो आती- जाती रहती है। परंतु जब हृदय देश में भगवान की मस्ती छा जाती है तो परिवर्तन नहीं होता अर्थात सदैव कायम रहता है। यह स्थिति फलप्रद गुणों से ही आती है। परन्तु उस क्रिया में प्रवृत्त होने में प्रारब्ध ही सहायक है। इस साधन में प्रारब्ध का विशेष स्थान है। इत्र इस जगत का सुगंधित द्रव्य है। यह इस रहनी में एक प्रतीक मात्र है। जब ईश्वरोपलव्धि में यह संपूर्ण खेल सुलभ हो जाता है तब योगी की इन्हीं इंद्रियों में परमात्मा की सुगंध का संचार हो जाता है। गुलाल रोरी इत्यादि जो सर्वत्र लगाये जाने वाले पदार्थ हैं योग की इस रहनी में ये सब ज्ञान संचार के प्रतीक हैं। जो इस स्थिति के महापुरुषों में प्राय: सदैव सबको मिला है। यह स्थिति हृदय में आती है। इसलिए ह्रदय रूपी झोली में वह रहनी और ज्ञान भरपूर रहता है। जैसा कि —
ऊ पूर्णमद: पूर्तमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते।
पूर्तस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
। अर्थात पूर्ण में से पूर्ण निकाल देने पर शेष पूर्ण ही बचा रहता है वह घटता नहीं ।
पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के गुरु महाराज श्री- श्री 1008 श्री अनंत विभूषित परमहंस स्वामी श्री परमानंद जी के श्री मुख से निसृत ईश्वरीय वाणी बारहमासी के माध्यम से पूज्य श्री स्वामी जी कहते हैं कि अविद्या रूपी होली को फूंककर स्वयं आनंद का स्वरूप बन जाते हैं, जो गुप्त है आनंद है अलख है उसी के स्वरूप में लीन हो जाते हैं। इसको कोई सुलझा हुआ विवेकी ही समझ पाता है, बुद्धिहीन नहीं। अब प्रश्न उठता है कि विवेकी कौन है? पूज्य श्री स्वामी जी कहते हैं महान विवेक का श्रोत महापुरुष होते हैं । साधना पथ में पढ़ाई का कोई महत्व नहीं है काया के बीर कबीर, महर्षि वाल्मीकि स्वयं पूज्य श्री गुरुदेव भगवान जिनकी संसारी शैक्षिक योग्यता कक्षा तीन तक ही है लेकिन उन्होंने हजारों वर्ष बाद जगत का सर्वोपरि शास्त्र यथार्थ गीता लिखा जिस पर आने वाली हायर की पीढ़ियां रिसर्च करेगी । पूज्य श्री गुरुदेव भगवान कहते हैं कि अविद्या रूपी होलिका तभी जलेगी जब नारद रुपी सद्गुरु मिलेंगे और तब जाकर प्रेम रुपी नर प्रहलाद नरसिंह होगा। कीचड़ रंग फेंकने हुड़दंग करने से यह स्थिति नहीं मिलेगी। इस दिन एकमात्र भगवान का चिंतन करें यथार्थ गीता पढ़ें और सद्गुरु का दर्शन करें, भजन करें, गीतोक्त साधना पर अमल करें।






