प्रयागराज ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
श्री परमहंस आश्रम श्रृंगवेरपुर में स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज द्वारा अमृत वर्षा
श्रृंगवेरपुर में 26 मार्च से ही आध्यात्मिक प्रवास पर हैं स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज
देश विदेश में कहीं भी जन्में, किसी भी परिस्थितिजन्य माहोल में पले बढ़े मानवता के लौकिक और पारलौकिक जीवन को कृतार्थ करने वाली भारतीय मनीषा की शोध श्री मद्भागवत गीता भाष्य यथार्थ गीता के प्रणेता विश्व के पालनहार विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज आजकल आजकल 26 मार्च से ही श्री परमहंस आश्रम पिपरीघाट श्रृंगवेरपुर में आध्यात्मिक प्रवास पर हैं। स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज एक ऐसे दिव्य व सिद्ध विश्वमय शख्शियत हैं जिन्होंने भगवान श्री कृष्ण के तत्समय के भाव को यथार्थ गीता में हू-ब-हू व्यक्त किया है। पूरी
दुनिया में व्याप्त ऊंच-नीच , जातिवंधन की भावना को तार- तार कर एक ईश्वर, उसे पाने की एक विधि अर्थात (सद्गुरु का ध्यान ओम/ राम/ शिव जप, व एक ही धर्म की वृहद व्याख्या) स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने यथार्थ गीता में वर्णित किये हैं। धर्म क्या है? कर्म क्या है? सत्य/असत्य , भक्ति क्या है? जाति, देवता, गाय, ईश्वर इत्यादि जैसे अनादिकालीन जटिल प्रश्नों का समाधान यथार्थ गीता में वर्णित है। पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज ने बताया है कि सभी वेद पुराण या संसार के समस्त महापुरुषों की वाणी का एक ही सार है कि ईश्वर/ सद्गुरु या भगवान आपके हृदय से कैसे रथी होकर मार्गदर्शन करें? स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज का चैलेंज है कि जितने अच्छे ढंग से भगवान हृदय से रथी होकर मार्गदर्शन करते हैं, योगक्षेम करते हैं, संभालने हैं, तो ऐसा देखभाल संसार में न तो सांसारिक मां-बाप कर सकते हैं और न ही अन्य कोई कर सकता है। जब तक हृदय से भगवान रथी न हो जाए तभी तक तीर्थ व्रत इत्यादि एलकेजी की पढ़ाई है और जैसे ही सद्गुरु की कृपा से भगवान हृदय से रथी होकर मार्गदर्शन करने लगे तो हमें उन्हीं के आदेश पर अक्षरशः चलना चाहिए। हृदय से रथी सद्गुरु के आदेश का अक्षरशः पालन ही भजन है। परमात्मा के पूर्तिपर्यंत हमें हृदय से रथी भगवान के आदेश पर यंत्रवत चलते रहना चाहिए। परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने गंगा के किनारे अवस्थित श्री परमहंस आश्रम श्रृंगवेरपुर से एलानिया घोषणा किये कि संसार में बसे कहीं भी मानव यदि श्रीमद्भागवत गीता भाष्य यथार्थ गीता में वर्णित गीतोक्त साधना का अक्षरशः अनुपालन करता है तो उसके हृदय से भगवान रथी होकर मार्गदर्शन अवश्य करने लगेगें । उसे हृदय से रथी भगवान को मनाने के लिए किसी भ्रांतियों में पड़ने की जरूरत है बल्कि गीतोक्त साधना का अक्षरशः पालन करना चाहिए। ज्ञातव्य हो कि यथार्थ गीता ईश्वरीय आदेश (आकाशवाणी) से ही अक्षरशः स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने संसार के कल्याणार्थ ( न कि किसी मजहब , जाति देश) लिखा है । यथार्थ गीता पूर्णरूपेण मज़हब मुक्त है। यह विश्वव्यापी मानवमात्र का एकमात्र धर्मशास्त्र है। पूज्य श्री स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज की कृपा से श्री परमहंस आश्रम पिपरीघाट श्रृंगवेरपुर के संत श्री वृजबिहारी जी महाराज भक्तों संत महात्माओं की सेवा में साभार लगे हैं।






