शक्तिषगढ़ ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
राज बब्बर कुत्ते की पुण्यतिथि पर शक्तिषगढ़ आश्रम में विशाल भंडारे का आयोजन
कुत्ते की योनी में संत रहनी थी राज बब्बर की, विशेष सजा था आश्रम
संगत से गुण होत है संगत से गुण जाए।
बांस फांस और मीसरी एकै भाव बिकाय।।
संगत के प्रभाव में आकर जानवर को इंसान और इंसान को जानवर बनने के कई उदाहरण हमारे आस पास दिखाई देते हैं। और अगर महापुरुष का संगत हो तो फिर कहना ही क्या? तब तो सूर्य को पश्चिम में उगने और पूर्व में डूबने की कहावत चरितार्थ होने लगती है। क्यों कि महापुरुष के संगत में आने वालों का देखभाल उनकी परख व उनकी पहचान उनके जन्म-जन्मांतर के संस्कार पर आधारित होते हैं। ऐसे ही राज बब्बर नामक कुत्ता विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म-शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष अनंत विभूषित करुणा निधान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के शरण- सानिध्य में पला-बढ़ा, भजन चिंतन किया और वहीं आश्रम पर ही शरीर का परित्याग कर दिया। सभी संत-जन बताते हैं कि वह कुत्ता योनि में रहकर भी उसकी रहनी संत की रही। वह हमेशा जगनेटर रूम में रहकर भजन किया करता था। पूज्य श्री जब सत्संग प्रवचन के लिए सत्संग हाल में आते थे तो उनके आने की आहट उसे स्वत: हो जाती थी। वह उनके दर्शन-पूजन के लिए पहले ही पहुंच जाता था। सत्संग के दौरान जब पूज्य श्री उससे कहते थे कि बब्बर अपने सोफे पर बैठ जा तो बब्बर तुरंत उनकी आज्ञा का पालन करता था ओर बैठ जाता था । राज बब्बर पुण्यात्मा था अपनी साधना भजन के बल पर वह बाल ब्रम्हचारी था। पूज्य श्री की कृपा से उसमें संत रहनी ढला -ढलाया था। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के पावन चरणों में आज से 17 दिन पहले उसने स्थान प्राप्त किया । उसी की पुण्यतिथि पर आज पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के आदेश से आश्रम में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। पूज्य श्री के आदेश से समस्त संत-जन आश्रम को विशेष ढंग से सजाये थे। राज बब्बर को पंजाब से कोई भक्त लाकर इसको पूज्य श्री के चरणों में चढ़ाया था। बचपन से इसका लालन-पालन देखभाल पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के कृपापात्र शिष्य श्री दीपक महाराज जी करते थे बड़ा होने पर उसकी देखभाल श्री राजेन्द्र महाराज जी करते थे। ज्ञातव्य हो कि पूज्य श्री के गुरु भगवान दादा गुरु के आश्रमीय परंपरा से ही ऐसे चमत्कारी संस्कार पशु-पक्षियों में देखे जाते रहे हैं । उदाहरणार्थ दादा गुरु की तपस्थली व उनके आशीर्वाद से भैरव कुत्ता दूसरे जन्म में अधिकारी बना, सुग्गी अगले जन्म में पंडिताइन बनी , बब्बर की ही तरह ब्रम्हचारी बंदर की संत रहनी जैसे तमाम उदाहरण हैं। पूरे आश्रम को पूज्य श्री गुरुदेव भगवान के अंतप्रेरणा से श्री मनीष महाराज के सौजन्य से बहुत ही भव्य नव्य तरीके से सजाया गया था।






