National media news ( nm news)

सम्पादक देवेन्द्र राय

September 20, 2026 8:50 pm

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आजादी के 79 वें वर्ष में भी जन्माधारित वर्ण-व्यवस्था के दंश से जूझ रहा भारत।

वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”

आजादी के 79 वें वर्ष में भी जन्माधारित वर्ण-व्यवस्था के दंश से जूझ रहा भारत।

वर्णव्यवस्था (ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र) यौगिक शब्दावली है यह साधना का क्रमोन्नत सोपान है यह सद्गुरुओं के दरबार की विषय-वस्तु है न कि धर्म के सियासी ठेकेदारों की — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

“वर्ण” व्यवस्था (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र) जिसने भारत को हजारों साल गुलाम रखा, जिसने आक्रांताओं को आक्रमण करने का अनुकूल माहौल बनाया, जिसने हमें एक रहने और नेक रहने का विरोध किया, जिसने हमें छुआ-छूत, अस्पृश्य , ऊंच-नीच, पाखंड , अंधविश्वास की भावना में रहने को मजबूर किया, जिसने हमारी सांस्कृतिक विरासत और गौरवमई इतिहास के पन्नों पर काले धब्बों से कलंकित किया आज उसी वर्ण व्यवस्था की व्याख्या जब विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष अनंत विभूषित करूणा निधान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने किया तो ऐसा महसूस होता है कि बहुत कुछ हम खो चुके हैं और अभी भी हम नहीं सुधरे तो बहुत कुछ खोने के लिए हमें तैयार रहना होगा। हखामनी आक्रमण से लेकर यवन, शक, हूण, मुगल ,डच ,फ्रांस, अंग्रेज आदि आक्रमणकारियों ने इस जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था का भरपूर फायदा उठाया। वे भारतीयता के अस्तित्व को मिटाने का भरपूर कोशिश किये। लेकिन भारतीय संस्कृति की सर्वग्राह्यता की विशेषता ने बचा लिया। चाहे हमारी मजबूरियां हो या इसी विशेषताओं के कारण उनके अकल्पनीय अत्याचार के बावजूद भी हम उन आक्रांताओं को अरजेस्ट करते गये। यहां तक अरजेस्ट करना पड़ा कि तत्समय की अपने आपको उच्च वर्ण घोषित कर चुकी जातियों को उनके साथ रोटी – बेटी का संबंध बनाना पड़ा। अधिकतर तथाकथित निम्न वर्ण के लोगों को उन्होंने अपने मजहबी रंग में रंग दिया और धीरे- धीरे हम इन्हीं भेड़िये आक्रांताओं के सामाजिक आर्थिक, धार्मिक, मानसिक व शारीरिक शिकार होते गए। हजारों वर्षों तक हम इन्हीं वर्ण व्यवस्था के दंश में जीने को मजबूर रहे। इन कलुषित वर्ण व्यवस्था का दंश हम पर इतना गहरा पड़ा कि अंतिम आक्रांता अंग्रेज से जब हमारे स्वतंत्रता सेनानी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे तो बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर का यह विचार था कि अंग्रेज अभी हिंदुस्तान में ही रहें नहीं तो उनसे ज्यादा अत्याचार दलितों पर तथाकथित उच्च वर्णों द्वारा किया जायेगा। फिलहाल 15 अगस्त 1947 को काफी संघर्षों के बाद फिरंगी हुकूमत से हमें आजादी मिली। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान पूर्ण रूप से लागू होने के बाद हम “रुल्स आफ ला” के अधीन पुष्पित पल्लवित होने लगे। हमारे संविधानविदों द्वारा सारा पावर हमारे संविधान की उद्देशिका में वर्णित “हम भारत के लोग” में उड़ेल दिया गया। उद्देशिका में राजनीतिक सामाजिक और लोकतंत्र को समानता और बंधुता से जोड़ते हुए जो स्थापित करने का प्रयत्न किया गया है उसे महात्मा गांधी ने मेरे स्वप्नों का भारत कहकर वर्णित किया है — *ऐसा भारत जिसमें गरीब से गरीब भी यह समझेगा कि यह उसका देश है जिसके निर्माण में उसका भी हाथ है। ….. वह भारत जिसमें सभी समुदाय पूर्णतया समरस होकर रहेंगे। ऐसे भारत में अस्पृश्यता के श्राप के लिए या मादक पेय और नशीली दवाओं द्रव्यों के लिए कोई स्थान नहीं होगा….।* संविधानविदों ने अस्पृश्यता की मुक्ति के लिए और वर्ण व्यवस्था के दंश का सर्वनाश करते हुए अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता का अंत कर दिया है जो 1976 से सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 हो गया है। जिसमें यह प्रावधान है कि अस्पृश्यता से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा। इसी क्रम में एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 पारित किया गया जो पूर्णतया एससी -एसटी के सदस्यों को संरक्षण देता है। लेकिन आज आजादी के 79 वें साल में प्रवेश के बावजूद भी धरातल पर सच्चाई कुछ और ही है। हम गांधी जी के “मेरे स्वप्नों का भारत” से कोसों दूर हैं। दलितों पिछड़ों का विश्वविद्यालयों, सिविल सर्विसेज, न्यायालयों, मीडिया, मेडिकल इत्यादि के क्षेत्रों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। यहां तक कि छुआ-छूत और अस्पृश्यता से भी हम मुक्त नहीं हो पाये हैं। कहीं दलितों पर पेशाब कर दिया जाता है, तो कहीं पिछड़े कथावाचकों का बाल छीलकर उसे बेइज्जत किया जाता है, कहीं भूलवश पिछड़ा या दलित नेता यदि मंदिर में चला जाता है तो मंदिर अपवित्र हो जाता है । उसे पवित्र करने के लिए मंदिर में जानवर के पेशाब का छिड़काव किया जाता है तब जाकर मंदिर पवित्र होता है। यानी पिछड़े और दलित जानवर के पेशाब से भी गंदे हैं और ताज्जुब तो तब होता है कि ऐसे धर्माधिकारियों पर सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं होती। ऐसे में गरीब से गरीब यह कैसे समझेगा कि यह देश उसका है? इससे यह साबित होता है कि हमने बाबा साहब अम्बेडकर समेत हमारे सारे संविधानविद , सारे संविधान निर्मात्री सभा के सदस्यों का लक्ष्य अभी हमने प्राप्त नहीं कर पाया है। जिसकी वजह से हम हजारों वर्षों तक विदेशी आक्रांताओं का शिकार होते रहे आज भी हम उससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। महान राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अतीत भारत के गौरवशाली व समृद्ध इतिहास पर मंड़राते संकट की काली छाया पर *भारत भारती* में मर्मान्तक वेदना का अनुभव करते हुए लिखा है कि — *हम कौन थे, क्या हो गये, और क्या होंगे अभी। आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएं सभी।।* इन सब के बावजूद भी वर्तमान सियासत पक्ष हो या विपक्ष, देश का चौथा स्तम्भ व बुद्धजीवी वर्ग सबके सब इन सब खामियों पर फोकस नहीं कर रहे हैं। आज से लगभग 5200 वर्ष पहले महापुरुष योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जो उपदेश गीता के रुप में कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया था उसी को यथार्थ गीता के रुप में परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने परिभाषित किया है। स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र यौगिक शब्दावली है जो सद्गुरु के शरण में रहकर साधना भजन- चिंतन का क्रमोन्नत सोपान का परिणाम है। यह आध्यात्मिक शब्दावली है, यह भगवान और भक्त के क्षेत्र की विषय-वस्तु है। न कि बाह्य जगत की विषय-वस्तु है। इसकी पुष्टि गीता के अध्याय चार के श्लोक 13 से भी हो जाती है। चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
*तस्यकर्तारमपि मां विद्वयकर्तारमव्ययम।।* अर्थात ” *चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं”* अर्थात चारो वर्णों की रचना मैंने की है तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बांटा? नहीं *गुणकर्मविभागश:* गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बांटा। गुण का आशय सात्विक, राजसी और तामसी है और कर्म का आशय *कर्म एक आराधना जेहिं विधि रीझैं राम* इसी आराधना के आधार पर महापुरुष योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इसी कर्म को ऊंची – नीची चार श्रेणियों में बांटा ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र। स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि कोई भी अनुरागी साधक जब शुरुआत में सद्गुरु के शरण- सानिध्य में रहकर भजन- चिंतन करता है तो उसका मन हवा से बात करता है मतलब उसका भजन चिंतन में मन नहीं लगता। तो उस समय केवल उसके लिए “*परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम।*” सद्गुरु व अपने से उन्नत अवस्था के संतों की सेवा का विधान है इससे उसके दूषित संस्कारों का शमन व साधना में प्रवेश दिलाने वाले संस्कार सबल होते जाएंगे । तो धीरे- धीरे उसमें राजसी गुणों की प्रधानता तथा सात्विक गुणों के स्वल्प संचार के साथ ही उसकी श्रेणी वैश्य की हो जाती है अर्थात वह वैश्य श्रेणी का साधक हो जाता है, उसी साधक में जब प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता आ गयी , कर्म में प्रवृत्त रहने का स्वभाव, शौर्य, पीछे न हटने का स्वभाव, सब भावों पर स्वामिभाव तब वही वैश्य श्रेणी का साधक क्षत्रिय श्रेणी का साधक हो जाता है। और जैसे ही उसी साधक में कर्म और सूक्ष्म होने पर उसमें मात्र सात्विक गुण कार्यरत रह जाने पर मन का शमन, इंन्द्रियों का दमन, एकाग्रता, सरलता, ध्यान, समाधि, ईश्वरीय निर्देश, इत्यादि ब्रम्ह में प्रवेश दिलाने वाली स्वाभाविक क्षमता आ गयी तो वही साधक ब्राम्हण श्रेणी का हो जाता है वह कैसे होता है? सद्गुरु व अपने से उन्नत अवस्था के संतों की शरण सानिध्य व सेवा से। तो ये है भगवान श्रीकृष्ण व स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज की विचारधारा में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र की शाश्वत व्याख्या। अब जरा गौर करें देश में कितने इस आधार पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र हैं। शायद करोड़ों में दो चार कोई विरले ही होंगे अन्यथा सबके सब जड़- जीव हैं। तो इन पावन पवित्र यौगिक शब्दावलियों को जन्माधारित घोषित कर कुछेक तत्समय के स्वार्थ में लिप्त पोंगापंथियों कर्मकांडियों पाखंडियों का समूह पूरे समाज का सत्यानाश कर दिया। इनके द्वारा यदि इन पवित्र यौगिक शब्दावलियों पर डकैती डालकर कलुषित नहीं किया गया होता तो उस समय समाज एक होकर तत्समय के आक्रांताओं से भारत भूमि की अस्मिता की रक्षा की गई होती । लेकिन दुर्भाग्यवश हम आज भी लोकतंत्र के विराट व्यक्तित्व की छाया में 21 सदी में प्रवेश कर चुके हैं। 15 अगस्त 2025 को हम 79वां स्वतंत्रता दिवस मनायेंगे। देश के अंदर और देश के बाहर हमें तरह – तरह की चुनौतियों का सामना करना है। ऐसे में हमें भगवान श्रीकृष्ण के विचारों को स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज द्वारा परिभाषित कर्म आधारित (भजन चिंतन आधारित) वर्ण-व्यवस्था को ब्रांडिंग (प्रचारित -प्रसारित) करते हुए जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था को ध्वस्तीकरण कर एक रहने नेक रहने का लक्ष्य हासिल करना है जिससे पुनः विश्व गुरु भारत पुनर्जीवित हो सके। हम खुद संसार का मार्गदर्शक बन सकें आईकान बन सकें। इन सब का लक्ष्य हम तभी हासिल कर पायेंगे जब हम गीता भाष्य यथार्थ गीता को अमल में लाएंगे।

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Author: NM News live

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24 घंटे में घर चोरी का खुलासा, चार लाख के आभूषण व तीन स्मार्टफोन बरामद नशे की लत पूरी करने के लिए चोरी करने वाला आरोपी गिरफ्तार, पुलिस ने शत-प्रतिशत माल बरामद किया सहसपुर। कोतवाली सहसपुर पुलिस ने घर में हुई चोरी की घटना का 24 घंटे के भीतर खुलासा करते हुए एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से करीब चार लाख रुपये कीमत के सोने-चांदी के आभूषण और तीन स्मार्टफोन बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार, महमूदनगर रामपुर निवासी आकाश कुमार ने 17 सितंबर को कोतवाली सहसपुर में तहरीर देकर बताया था कि अज्ञात व्यक्ति ने रात के समय उसके घर से सोने-चांदी के आभूषण और स्मार्टफोन चोरी कर लिए। तहरीर के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। घटना की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर पुलिस अधीक्षक देहात और क्षेत्राधिकारी सहसपुर के पर्यवेक्षण में पुलिस टीम गठित की गई। टीम ने घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तथा संदिग्ध की तलाश के लिए मुखबिर तंत्र सक्रिय किया। 18 सितंबर को मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने घटना में शामिल आशिक पुत्र सलीम, निवासी महमूद नगर शंकरपुर, थाना सहसपुर, उम्र 27 वर्ष को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उसके कब्जे से चोरी किए गए आभूषण और तीन स्मार्टफोन बरामद किए। बरामदगी के आधार पर मुकदमे में संबंधित धाराओं की बढ़ोतरी की गई। पूछताछ में आरोपी ने पुलिस को बताया कि वह नशे का आदी है और नशे की पूर्ति के लिए उसने चोरी की घटना को अंजाम दिया। पुलिस ने आरोपी को न्यायालय के समक्ष पेश किया। बरामद सामान: एक पीली धातु का मंगलसूत्र, एक जोड़ी पीली धातु के कानों के टॉप्स, चार जोड़ी सफेद धातु के बिछुए और तीन स्मार्टफोन। आरोपी का आपराधिक इतिहास: पुलिस के अनुसार आरोपी के विरुद्ध वर्ष 2022 से 2026 तक चोरी, आर्म्स एक्ट सहित विभिन्न धाराओं में पांच मुकदमे दर्ज हैं। पुलिस टीम में उपनिरीक्षक जावेद हसन, कांस्टेबल नवबहार और कांस्टेबल अनुराग शामिल रहे।