संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
दशहरा पर्व मोहरूपी रावण का हनन करने वाले राम का है न कि किसी देवी का — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
मोहरूपी रात्रि से परम प्रकाश परमात्मा के नवीन दिशा में रत होना ही नव रात्रि है
दसवें दिन दशहरा यानी दश- हारा , दशों इंद्रियों की बहिर्मुखी प्रवाह की हार/ निरोध ही दशहरा है।
गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहु। आरत अधिकारी जहं पावहि।।
नवरात्रि/ देवी पूजा/ दशहरा का आशय—- *अनादिकाल से ऋषि-मुनियों के गूढ़ से गूढ़ आध्यात्मिक मिथकों के बाल की खाल निकालने वाले, यथार्थ व्याख्याकार संत महात्माओं श्रद्धालुओं भक्तों के हृदय सम्राट भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने अपने उद्बोधन में भक्तों को बताया कि मोह रुपी रात्रि से जब हम हृदय स्थित अंतर्यामी परमात्मा की ओर जिस दिन से साधना प्रारंभ करते हैं उसी दिन से जग गये एक नवीन दिशा में रत हो गये, इसी को नवरात्रि कहते हैं। उन्होंने देवी, राम, दशहरा आदि गूढ़ तत्व की जटिलता को सरलीकरण करते हुए बताये कि ईश्वर का निवास सभी प्राणियों के अंतःकरण में है, ईश्वरीय शक्ति ही देवी है, जिसके द्वारा सर्वव्यापी भगवान ( ईष्ट) के नाम जप, ईष्ट के ध्यान, लीला तथा धाम में मन को रमाया/ टिकाया जाता है परन्तु ईश्वरीय शक्ति बहिर्मुखी होकर सांसारिक विषयों में बिखरी हुई है, उसी शक्ति को इंद्रिय संयम द्वारा अंतःकरण में अर्जित करते जाना ही “देवी” पूजा है। यहीं साधक के अराधना पथ में नवरात्रि (नव इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना) बन जायेगी और दसवें दिन दशहरा यानी दश- हारा, दसों इंद्रियों की बहिर्मुखी (सांसारिक) प्रवाह की हार यानी निरोध होते ही अनुभव (ज्ञान/ विज्ञान/ राम) द्वारा मोह रूपी रावण पर जीत हासिल हो जाती है, और साधक को भगवत्ता मिल जाती है। विषयों का सेवन करने से उनके सेवन की इच्छा बढ़ती ही जाती है कई महात्माओं को देखा गया कि घर से मोह हटा तो कुटिया में मोह हो गया, कुटिया से हटा तो छड़ी में मोह हो गया, छड़ी से कमंडल में हो गया । मोह ही रावण है। भजन छोड़कर जहां भी कहीं दृष्टि पड़ी तो वही मोह है। यही रावण के सिरों का बढ़ना है। यही *नाभिकुंड पियुष बस याके* नाभि अर्थात केंद्र! जहां संस्कारों का संग्रह होता है , वहीं आत्मिक संचार भी है जो मोह से आवृत्त है। परावाणी ही बाण है जब चिंतन परावाणी की कसौटी तक पहुंच गया तो राम का बाण लगते ही आत्मिक संचार जो मोह में व्यय हो रहा था, सिमट कर राम में आ गया। मोह धराशाई हो गया। अब रावण कभी नहीं जियेगा। मोह के मिटते ही सिरों की वृद्धि समाप्त। वहीं दशानन का अंत है। यही विजय दशमी सारी सृष्टि ने मनाया और जब राम का राज्याभिषेक हुआ तो लक्ष्मी का ऐश्वर्य जो बिखरा था, अवध में आ गया। इस प्रकार जब रावण मारा गया तो राम जी के उत्सव को सभी ने मनाया। लाखों वर्षों के दुख का कारण समाप्त हो गया। मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो गया इस प्रकार विजयदशमी का उत्सव राम का है न कि किसी देवी का। यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी पूज्य गुरुदेव भगवान ने बताया कि संसार के सभी महापुरुष आदिशास्त्र गीता के ही संदेश वाहक हैं। संसार में एक ही भगवान है और उनको पाने की विधि भी एक ही है, जो चित्त प्रकृति में लगा है, उधर से मोड़कर भगवान में जोड़ना है, मन जहां जहां संसार में उलझा है वहां-वहां से हटाकर परमात्मा में लगाना है इस मन को लगाने में कुछ नियम है , शौच अर्थात मन क्रम वचन से पवित्रता , संतोष, तप ,स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान इत्यादि जिन्हें गीता में क्रमवद्ध बताया गया है। हमारे धर्मशास्त्र गीता में एक ही ईश्वरोपासना का विधान है देवी पूजन आधुनिक की देन है जो गीता शास्त्र के विरुद्ध है। गीता के अनुसार अविधिपूर्वक है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा अर्जुन ! जो शास्त्र विधि को छोड़कर अन्य अन्य विधियों से मनमाना आचरण करता है, उसके लिए न सुख है न शांति है। वह उन सबसे भ्रष्ट हो जाता है* — *य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।
न स सिद्धिमवाप्रोति न सुखं न परां गतिम्।।
कौन है मधु और कैटभ राक्षस?-— *पूज्य गुरुदेव भगवान बताते हैं कि प्रकृति में दो भयंकर असुर हैं। यह सृष्टि स्वर्णिम है प्रकृति में जो माधुर्य दिखाई दे रहा है, यही मधु है ; और कैटभ है उसके प्रति कर्तव्य करने की विवशता। रूप, रस ,गंध ,शब्द और स्पर्श इन पांचों तन्मात्राओं में आसक्ति ही “मधु – कैटभ” दैत्यों से पांच हजार वर्षों तक चलने वाला युद्ध है। आंखें रूप देखती है कान शब्द सुनते हैं, जिह्वा रस चाहती है। जब तक इनमें माधुर्य है तब तक योग साधना चलेगी। जहां रसास्वादन समाप्त हुआ, प्रकृति समाप्त! प्रकृति का माधुर्य समाप्त! नीचे विषय रूपी वारि है, तब तक यह संघर्ष चलेगा, साधना चलेगी भगवान रक्षा करेंगे। इसी प्रकार जब तक ब्रम्हपीयूष अप्राप्त है तब तक यह संघर्ष चलेगा, साधना अपूर्ण है। जब विषयवारि समाप्त और ब्रम्हपीयूष भी अलग नहीं रह गया, प्राप्त हो गया तो जलाशय समाप्त। जहां भगवान की प्रत्यक्ष जानकारी हुई तो योगयुक्ति प्रत्यक्ष हो गई, उस स्तर पर साधना चक्र पहुंचा तो प्रकृति का माधुर्य सदा के लिए समाप्त हो जाता है और न उसके प्रति कर्तव्य रह जाता है, मधु और कैटभ सदा के लिए मारे जाते हैं। आसुरी संपद सदा के लिए शांत हो जाता है। पुरूष अपने सहज स्वरूप में स्थित हो जाता है। पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि ये मधु और कैटभ अलग से कोई शत्रु जन्मे ही नहीं। दैवीय सम्पद जो परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलाती है, प्रकृति की आसुरी वृत्ति को काटती है, उसी का चित्रण है किंतु नासमझ लोग उन असुरों और देवियों के मंदिर बना डाले, मधु और कैटभ कोई राक्षस हुए ही नहीं।
महिषासुर कौन है?- पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं गीता के अनुसार मनुष्य दो प्रकार का होता है एक असुरों -जैसा और दूसरा देवताओं जैसा। जिसके हृदय में दैवीय सम्पद प्रवाहित है वह देवता जैसा और जिसके हृदय में आसुरी संपद प्रवाहित है वह असुर है । दैवीय सम्पद परम कल्याण के लिए है। परमात्मा का देवत्व अर्जित करते- करते चित्त की निरोधावस्था में परम तत्व परमात्मा का दर्शन स्पर्श और उसमें स्थिति प्राप्त हो जाती है। जब तक ( देवता) दैवीय सम्पद बिखरी है तब तक शरीर में महिषासुर कार्यरत रहता है । मही का अर्थ है पृथ्वी । आसुरी सम्पद को प्राप्त पुरुष कहता है कि भगवान नाम की कोई वस्तु नहीं है, इस संसार में जो कुछ है स्त्री पुरुष के सहयोग से उत्पन्न है, मैं ही ईश्वर और ऐश्वर्य का भोक्ता हूं, मेरे पास इतना धन है, इतना और होगा, यह शत्रु मारा गया व मारा जायेगा, मैं बड़ा कुटुम्ब वाला धनवाला और पृथ्वी का स्वामी हूं- अंत:करण की यह वृत्ति ही महिषासुर है। यह आसुरी वृत्ति है। जब तक यह वृत्ति है, तब तक उसके साथ सहस्त्रों अनन्त वृत्तियां है। यह रक्तबीज है। *करतहुं सुकृति न पाप सिराही। रक्तबीज जिमि बाढ़त जाहीं।।* पाप एक ओर से समाप्त करें तो दूसरी ओर से पुनः जीवित हो उठता है। यही रक्तबीज का रहस्य है। भगवान की कृपा और उनके प्रति समर्पण से ही ये आसुरी वृत्तियां जा सकती हैं, अन्य कोई उपाय नहीं है।
कौन है शुम्भ और निशुम्भ?—-– पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि सृष्टि का सौंदर्य ही शुम्भ है और निशुम्भ अर्थात न होते हुए भी जो सत्य प्रतीत होता है। वास्तव में उसका कोई अस्तित्व नहीं है शुम्भ के वैभव सौन्दर्य में थे — हाथी घोड़े महल इत्यादि सृष्टि के सौन्दर्य! उस सौन्दर्य की नश्वरता, उसकी कालिमा वीभत्स दृश्य कौशिकी देवी के समक्ष आया तो उसे इस वैभव से अरुचि हो गई यही है कि काली असुरों की सेना को सेनापति चंड ,मुंड, रक्तबीज, इत्यादि को हाथी – घोड़े, रथ समेत खा गयी जब देवी ने संघर्ष किया तो सारे देवो की शक्तियां भी उनके साथ सम्मिलित हो गयी। सभी देवताओं के अस्त्र-शस्त्र भी आ गये जब सारी दैवी शक्ति एक हो गयी तो दैवी सम्पद जीत गयी , शुम्भ और निशुंभ मारे गए। यही है कि असुरों को देवी ने मारा। काल की गति सदा के लिए शांत हो गई। द्रष्टा अपने परमात्म स्वरूप में स्थित हो गया जगत रुपी रात्रि का संचालन करने वाली कालरात्रि पर विजय प्राप्त हो गयी। शनै: शनै: उत्कर्ष करते हुए जब दैवी सम्पद पूर्ण हुई, काल की गति सदा के लिए शांत हो गई काली विलीन हो गयी। इसके पश्चात काल की गति आगे नहीं है। आगे है ज्योतिर्मय परमात्मा! केवल उनकी विभूति। अब प्रकृति जन्म दे, मृत्यु दे — ये संस्कार कट गये। जन्म मृत्यु से परे परम तत्व परमात्मा हैं। वह सहज प्रकाश स्वरूप है व प्रकृति के मिटते ही ईश्वरीय विभूतियां उतर आती है
एक ईश्वर की आराधना जो सबके हृदय में है —* *पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि ओम राम अथवा शिव अनादि कालजथ से यही दो ढाई अक्षर का नाम का जप किया जाता है, यही नाम ही सद्गुरु भगवान के पास पहुंचा देगा। उन्होंने बताया कि ओम् अर्थात ओ माने वह अविनाशी परमात्मा अहं माने आप स्वयं अर्थात वह अविनाशी परमात्मा सबके हृदय में वास करता है इसलिए भगवान को हृदय में ढूंढ़े ह्रदय में ही मिलेंगी जिसको पाने की कुंजी सद्गुरु होते हैं। राम अर्थात रमन्ते योगिन यस्मिन स: राम: , योगियों के ह्रदय में रमण करने वाले ही राम हैं अर्थात यहां भी एक ईश्वर की आराधना हृदय में ही विधान है, अन्यत्र नहीं। शिव अर्थात प्रकृति की अनंत सीमाओं से परे जो ऊपर बैठा है यहां भी है हमारे चारों तरफ है वही शिव है। पूज्य गुरुदेव भगवान ने कहा कि जैसे जैसे ओम् जप करते जायेंगे दो एक महीने में आपको आभास होने लगेगा कि आपके आगे पीछे कोई है उसी को कहते हैं भगवान का हृदय से रथी होना, भगवान धीरे धीरे आपको माया मोह आदि प्रकृति के झंझावातों से उठाकर एक नई दुनिया परमात्मा के परिक्षेत्र में उठा कर कर देगा इसी को नवरात्रि कहते हैं फिर मोहरूपी रावण का बध होगा और दशहरा का दिन आयेगा।
Author: NM News live
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