अम्बेडकर नगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
भगवान की प्रेरणा से यथार्थ गीता पाठ आयोजन
जा मरने से जग डरा सो मेरो आनंद।
कब मरिहों कब पाइहों पूरन परमानंद।
दादा गुरु अक्सर कहा करे “हो जब तक भगवान हृदय से रथी होकर योग क्षेम न करने लगे , बतियाने न लगे तब तक लाख आंख मूंदों उसका कोई मतलब नहीं’ दादा गुरु के शिष्य समय के महापुरुष विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज जी कहते हैं कि भगवान तभी रथी होते हैं जब तक
सद्गुरु के समक्ष पूर्णरूपेण भाविक का समर्पण नहीं होता, जब साधक समर्पित होकर भगवान का भजन करता है सद्गुरु की टूटी फूटी सेवा करता है, उनकी आज्ञा में यंत्रवत चलता है, तब सद्गुरु भगवान उसके हृदय से रथी होकर उसका योगक्षेम करने लगते हैं, साधक को उठाने बैठाने सोवाने जगाने लगते हैं सेकेंड मिनट में अपने साधक को सिग्नल देने लगते हैं,। ये सिग्नल चार तरीके से सद्गुरु भगवान साधक को बताते हैं स्थूल सुरा संबंधी- अनुभव, स्वप्न सुरा संबंधी- अनुभव, सुषुप्ति सुरा- संबंधी अनुभव और समसुरा संबंधी- अनुभव। पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि सद्गुरु भगवान इन अनुभवों को जन्म
जन्मांतर तक अपने साधक को तब तक देते रहते हैं कि जब तक कि वह परमात्मपर्यंत की दूरी तय नहीं कर लेता। जन्म और मृत्यु के बीच संस्कारों को भष्माशात करने के बाद ही सद्गुरु भगवान प्रदत्त ये चारो सिग्नल शांत होते हैं। पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि संसार को यथार्थ गीता का अध्ययन करना चाहिए गीतोक्त साधना पर चलना चाहिए, उन्होंने बताया कि जो भी गीतोक्त साधना पर चलेगा उसके हृदय से मैं रथी होकर उसका योगक्षेम मार्गदर्शन करूंगा। गुरूदेव भगवान की प्रेरणा से ही रामजीत शर्मा पक्खनपुर बिछैला ने यथार्थ गीता पाठ व भंडारे का भी आयोजन कराया। सैकड़ों
भक्तों श्रद्धालुओं ने इस कार्यक्रम में भाग लेकर गुरूदेव भगवान की गीतोक्त साधना को सुना और उस पर दृढ़तापूर्वक चलने के लिए गुरूदेव भगवान से आराधना की । ओम जप करने से, सद्गुरु का ध्यान सेवा सुश्रुषा करने से, व ईश्वरीय वाणी यथार्थ गीता को चार बार आवृत्ति करने से भगवान के प्रति खिंचाव होने लगता है और तब सद्गुरु भगवान साधक के लौकिक और पारलौकिक जीवन की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेते हैं।
Author: NM News live
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