संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
संसार से अतीत करा देने वाली विशेष जाग्रति अनुभव कहलाती है — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
अनुभव एक ऐसा शब्द है जिसकी डिमांड हर क्षेत्र में होती है कंपनी हो ,फैक्ट्री ,व्यापार, राजनीति या अन्य कोई जगह हर जगह इसकी पूछ है, बिना अनुभव के व्यक्ति शायद ही कहीं सफल हो पाता हो, अनुभव के विषय में विश्व प्रसिद्ध महान साहित्यकार शेक्सपियर ने लिखा है कि “our wisdom comes from our experience, our experience comes from our foolishness” “अर्थात हमारा बुद्धि हमारे अनुभव से प्राप्त होती है और हमारा अनुभव हमारे मूर्खतापूर्ण कार्य से प्राप्त होता है।”* ये रहा सांसारिक अनुभव की व्याख्या जिसकी
आवश्यकता भौतिक जीवन को सफल बनाने में काम आती है। लेकिन अब सांसारिक जीवन से इतर अध्यात्मिक जीवन की व्याख्या विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी, अलमस्त, सर्वज्ञ, सनातन संस्कृति के वाहक परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के अमृतमय मुखारविंद से जो आज सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ उसकी व्याख्या उन्हीं के शब्दों में चित्रित है। संसार को आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करने वाली यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस श्री स्वामी जी ने “अनुभव” की व्याख्या करते हुए मोक्षदायिनी ज्ञान गंगा केंद्र श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ में हजारों
की संख्या में उपस्थित संत महात्माओं श्रद्धालुओं में बताया कि संसार से अतीत करा देने वाली विशेष जाग्रति को अनुभव कहते हैं। आध्यात्मिक आभा से संसार को गुलजार करने वाले कालजयी महापुरुष पूज्य श्री स्वामी जी ने कहा कि अनुभव साधक के हृदय की विशेष जाग्रति का नाम है जो सद्गुरु की कृपा से साधक को वरदान स्वरूप प्राप्त होती है। सद्गुरु भगवान जब अपनी दिव्य दृष्टि से साधक को अपने में अनुगमन कराते हैं और ऐसे सद्गुरु का कृपापात्र साधक जब उनकी सेवा सुश्रुषा उनके आदेश में यंत्रवत चलता है, तब वह एक दिन परब्रह्म परमात्मा के स्वरूप में गमन कर जाता है। प्रारम्भिक अवस्था का अबोध बालक की तरह जब सद्गुरु की शरण में साधक एंट्री करता है तो सद्गुरु भगवान की पूजा-अर्चना टूटी- फूटी सेवा व अपने से श्रेष्ठ सत्यान्वेशी शिष्यों की सेवा करते हुए उसमें विशेष आध्यात्मिक आभा का प्रस्फुटन होता है जिसे अनुभव कहते हैं जो चार प्रकार के होते हैं स्वप्न सुरा संबंधी- अनुभव, स्थूल सुरा संबंधी- अनुभव , सुषुप्ति सुरा संबंधी- अनुभव और समसुरा संबंधी- अनुभव। पहला स्थूल सुरा संबंधी अनुभव में आप चिंतन में बैठे हैं।कब आपका मन लगने वाला है ? कितनी सीमा तक लग गया है? कब मन भागना चाहता है और कब भाग गया? इसको हर मिनट- सेकेंड पर ईष्ट अंग- स्पंदन से संकेत करते हैं। अंगों का फड़कना स्थूल सुरा -संबंधी अनुभव है, जो एक पल में दो चार स्थानों पर एक साथ आता है और विचारों के विकृत हो जाने पर मिनट – मिनट पर आने लगेगा। यह संकेत तभी आता है, जब इष्ट के स्वरूप को आप अनन्य भाव से पकड़े अन्यथा साधारण जीवों में संस्कार के टकराव से अंग – स्पंदन होते रहते हैं, जिनका इष्टवालों से कोई संपर्क नहीं है।
दूसरा अनुभव स्वप्न सुरा संबंधी होता है। साधारण मनुष्य अपनी वासनाओं से संबंधित होता है। साधारण मनुष्य अपनी वासनाओं से संबंधित स्वप्न देखता है ; किंतु जब आप इष्ट को पकड़ लेंगे तो यह सपना भी निर्देश में बदल जाता है। योगी सपना नहीं देखता है होनी देखता है । पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि उपर्युक्त दोनों अनुभव प्रारम्भिक हैं ‘ किसी तत्व स्थित महापुरुष के सानिध्य से, मन में उनके प्रति श्रद्धा रखने मात्र से, उनकी टूटी फूटी सेवा से भी जाग्रति हो जाते हैं; किंतु इन दोनों से भी सूक्ष्म शेष दो अनुभव क्रियात्मक है, जिन्हें चलकर ही देखा जा सकता है। तीसरा अनुभव सुषुप्ति सुरा संबंधी अनुभव होता है। संसार में सब सोते ही तो हैं। मोह निशा में सभी अचेत पड़े हैं। रात दिन जो कुछ करते हैं स्वप्न ही तो है। यहां सुषुप्ति का शुद्ध अर्थ है, जब परमात्मा के चिंतन की ऐसी डोर लग
जाय कि सुरत( ख्याल) एकदम स्थिर हो जाय, शरीर जागता रहे और मन सुप्त हो जाय। ऐसी अवस्था में वह इष्ट देव फिर वह अपना एक संदेश देंगे। योग की अवस्था के अनुरूप एक रूपक (दृश्य)आता है, जो सही दिशा प्रदान करता है, भूत भविष्य से अवगत कराता है। पूज्य दादा गुरु कहा करते थे कि डाक्टर जैसे बेहोशी की दवा देकर, उचित उपचार देकर होश में लाता है ऐसे ही भगवान बता देते हैं। चौथा और अंतिम अनुभव समसुरा संबंधी अनुभव है। जिसमें सुरत (ख्याल) लगायी थी उस परमात्मा से समत्व प्राप्त हो गया। उसके बाद उठते बैठते चलते फिरते सर्वत्र से उसे अनुभूति होने लगती है। ऐसा योगी त्रिकालज्ञ होता है। यह अनुभव तीनों कालों से परे अव्यक्त स्थिति वाले महापुरुष आत्मा से जाग्रति हो कर अज्ञान जनित अंधकार को ज्ञानदीप से नष्ट करके करते हैं। अनुभव जो एक विशेष जाग्रति है वह सद्गुरु की देन होती है वे कहते हैं कि साधक के समर्पण को देख मैं ही एक अवस्था आने के बाद उसके हृदय से रथी हो जाता हूं।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।
पूज्य गुरुदेव भगवान ने अपने उद्बोधन में कहा कि सद्गुरु ही साधक पर अनुग्रह करने के लिए आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाते हैं। अर्थात साधक के हृदय से रथी हो जाते हैं और रथी होकर अज्ञान से उत्पन्न हुए अंधकार को ज्ञान रूपी दीपक के द्वारा प्रकाशित कर नष्ट करते हैं। पूज्य गुरुदेव भगवान कहते हैं कि जब तक वह परमात्मा आपके आत्मा से ही जाग्रति होकर पल -पल पर संचालन नहीं करता, इस प्रकृति के द्वन्द्व से निकालते हुए स्वयं आगे नहीं ले चलता, तब तक वास्तव में यथार्थ भजन आरंभ ही नहीं होता। वैसे तो भगवान सर्वत्र से बोलने लगते हैं, लेकिन प्रारम्भ में वे स्वरूपस्थ महापुरुष द्वारा ही बोलते हैं। पूज्य गुरुदेव भगवान ने कहा कि यदि ऐसे महापुरुष आपको प्राप्त नहीं है तो वे स्पष्ट नहीं बोलेंगे।
Author: NM News live
Post Views: 352






