*संपादकीय द्वारा अम्बेडकर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”*
मोह रात्रि से परमात्मपथ में रत होना ही नवरात्र है — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष कालजयी परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने नवरात्र पूजा -पद्धति पर हजारों की संख्या में उपस्थित भक्तों संत महात्माओं के बीच एक लंबा व्याख्यान दिया । उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि संसार में मनाया जाने वाला कोई भी पर्व हो वह संसार को एक अध्यात्मिक संदेश देता है। लेकिन संसार उस अध्यात्मिक संदेश की जगह धीरे धीरे भ्रान्ति वश बाह्य पूजन पद्धति में लग जाता है जब कोई समय का महापुरुष अवतरित होकर इन भ्रांतियों का समन कर उस अध्यात्मिक ज्ञान को प्रचारित प्रसारित करता है तब संसार विशुद्ध अध्यात्मिक ज्ञान से आलोकित हो पाता है। उन्होंने कहा कि भारत में मनाये जाने वाले त्योहारों में रक्षाबंधन होली दीपावली दशहरा नवरात्र आदि जैसे विभिन्न त्योहार विभिन्न अध्यात्मिक ज्ञान के संदेशवाहक हैं। ठीक उसी प्रकार नवरात्र त्योहार भी है जिसका स्पष्ट संदेश है कि *”मोहनिशा अर्थात मोहरात्र से परमात्मपर्यंत की दूरी तय कराने वाली साधना में रत होना ही नवरात्र है”*।
*मोह निशा सब सोवन हारा । देखहि स्वपन अनेक प्रकारा ।।*
*या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।*
*यस्यां जाग्रति भूतानी सा निशा पश्यतो मुने:।।*
उन्होंने बताया कि संसार दिन रात मोह निशा में सोया हुआ है हर पर्व हो या हर महापुरुष हों एक ही परमात्मा के भजन का संदेश और इस मोह निशा से निकल कर भगवान की साधना में रत होने के लिए कहते हैं जहां शास्वत सुख है सदा रहने वाली शांति है और सदा रहने वाली समृद्धि है।
गीता, वेद और उपनिषद में एक परमात्मा के ही पूजन का निर्देशन किया गया है। स्वामी रामकृष्ण देव ने भी यही उपदेश दिया। उनके बड़े भाई ने उन्हें काली माई की पूजा अर्चना के कार्य में नियुक्त कराया था। तोतापुरी जी की शिक्षाओं का उन पर बहुत प्रभाव था। विरक्ति की आशा से सेवा में रहने वाले अपने शिष्यों से उन्होंने कहा कि “*त्रेता में जो भगवान राम थे द्वापर में जो भगवान कृष्ण थे उन्हीं की आत्मा मुझमें है। मैं उसी स्वरूप को प्राप्त हूं। तुम लोग संदेह न करना”* इस प्रकार महापुरुष के स्वरूप का ध्यान उनकी शिक्षाओं का मूल था। उनके प्रधान शिष्य स्वामी विवेकानंदजी के प्रवचनों में सर्वत्र गीता और उपनिषद की शिक्षाओं पर चलने का निर्देश मिलता है। इस प्रकार एक परमात्मा से भिन्न उनकी पूजा कदापि नहीं है आजकल चार वर्णों तथा असंख्य जातियों उपजातियों में बंटा भारतीय समाज एक परमात्मा के स्थान पर अनेक देवी-देवताओं की पूजा कर रहा है। ब्राह्मण, सरस्वती ,क्षत्रिय, दुर्गा ,वैश्य, लक्ष्मी और शूद्र वन भूत -भवानी की पूजा में उलझा हुआ है, जिनका नाम तक इस गीता शास्त्र में नहीं है। महाभागवत( देवी पुराण) में दुर्गा के नौ स्वरूपों या नौ देवियों का उल्लेख है जिनकी पूजा नवरात्रि में नौ दिन की जाती है देवी पुराण में है कि जो शारदिक और बासन्तिक नवरात्रि में दुर्गा पूजा नहीं करते, वे पापी है। कोई शैव हो, वैष्णव हो, शाक्त हो ,सूर्य उपासक हो या गणेश का उपासक हो सबको देवी का नवरात्र पूजन, करना चाहिए जिसमें *महिषैश्छाग मेषकै:* मत्स्य, मांस इत्यादि बकरा, काशर अर्थात भैंसा और मेष अर्थात भेंड़ के द्वारा मेरा पूजा करना चाहिए। नवरात्र पूजन द्वारा ही भगवान राम ने रावण पर विजय पायी थी, दशमीं के दिन देवी की मिट्टी की प्रतिमा को उन्होंने समुद्र में विसर्जित किया था। इस प्रकार सबको नवरात्र – पूजन करना चाहिए। नव देवियों के नाम हैं — शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी ,चंद्रघंटा कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। *वस्तुत: ये नौ अलग- अलग देवियां नहीं बल्कि पार्वती जी के ही विभिन्न संशोधन है* जैसे *नं- १*– उन्होंने हिमांचल के यहां जन्म लिया तो शैलपुत्री कहलायी।
*२–* उन्होंने घोर तपस्या की, ब्रम्हचर्य ब्रत का पालन किया तो उन्हें ब्रम्हचारिणी कहा गया ।
*३—* यह तपस्या उन्होंने चंद्रमौली शिव के लिए किया इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा गया।
*४–* उनकी तपस्या इतनी उग्र थी कि ब्रम्हांड में उनकी तपस्या की गूंज होने लगी तो उनका नाम कुष्मांडा पड़ गया।
*५–* भगवान शिव से विवाह के उपरांत उन्हें पुत्र हुआ तो स्कन्द माता कही गयीं ।
*६–* कर्म करके ही उन्होंने लक्ष्य प्राप्त किया इसलिए कात्यायनी कही गई
*७–* दुर्धष काल को भी कवलित करने वाली होने से उन्हें कालरात्रि कहा गया है
*८–* प्रकृति की कालिमा, समाप्त हो जाने से वह महागौरी कही गईं।
*९–* भगवान के स्वरूप में स्थिति मिलने वाली परमसिद्धि को उन्होंने प्राप्त कर लिया था और जो भी उनमें श्रद्धा रखे, उसे भी सिद्धि की प्रेरणा प्रदान करने वाली होने से उन्हें सिद्धिदात्री कहा गया।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी माता पार्वती की वंदना में लिखा — *जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेश मुख चंद्र चकोरी।।*
*जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।।*
“*जय जय गिरिबरराज किसोरी*” — गिरिराज की किसोरी! बच्चे होते हैं तो उन्हें माता-पिता के नाम से उन्हें पुकारते ही है कि उनकी बेटियों को बुलाओ। विवाह हो गया तो *जय महेश मुख चंद्र चकोरी* — जिसके साथ विवाह हुआ, उसके मुख की चकोरी हो जाती है, लोग कहते हैं कि उनकी दुलही को बुलाओ। संतान हो जाने पर कहते हैं गुड़िया की, गुड्डी की माता जी को बुलाओ। वृद्ध हो जाने पर “जगत जननि” – वह सबकी माता हो जाती है, ” दामिनी दुति गाता”– जीवन भर की जानकारियों से भावी पीढ़ियों को आलोकित करती है। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों के ये आदर्श सम्बोधन सदा से रहे हैं। माता पार्वती के ये नौ नाम उसी प्रकार हैं जैसे भगवान श्री कृष्ण के अनेकों नाम कहे जाते हैं, श्याम वर्ण होने से उन्हें कृष्ण कहा जाता था, आज भी किसी लड़के का रंग काला है तो उसका नाम कल्लू रख देते हैं। उस समय भाषा संस्कृत थी तो कह दिया कृष्ण! लड़की श्याम वर्ण की है तो कह दिया कृष्णा । कृष्ण संबोधन लोगों को इतना प्रिय था कि आज भी *हरे कृष्ण** *हरे कृष्ण* की रट लगी है। जब उन्होंने गोचारण किया तो गोपाल। कालिया नाग को नाथा तो नागनथैया की जय। गोवर्धन उठाया तो गिरधारी। मुर दैत्य को मारा तो मुरारी। जरासंध को भुलावा देकर युद्ध के मैदान से निकल गये तो रणछोड़। द्वारिका गये तो द्वारिकाधीश। पूज्य गुरुदेव भगवान ने कहा कि इसी तरह अर्जुन के दस नाम थे। राजकुमार उत्तर ने कहा था – यदि आप अर्जुन हैं तो अपने दस नामों का परिचय दे। अर्जुन ने बताया। इसी प्रकार पार्वती के ये नौ नाम हैं। ये नाम कहीं से आते नहीं, कृतत्व के आधार पर बनते ही चले जाते हैं। नवरात्र पूजन का विधान भी शाक्त मतावलंबियों द्वारा प्रचारित आधुनिक पूजन है। वस्तुत: भारत में शारदीय नवरात्र में विजयादशमी और वासन्तिक नवरात्र चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान राम का जन्मदिन मनाया जाता है। रावण के दस सिरों का हरण होने से आजकल उत्तर भारत में विजयादशमी को बहुत से लोग दशहरा कहने लगे हैं जबकि ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा मनाया जाता है। ब्रम्ह पुराण (६३/१५) में है कि यह तिथि दस पापों को हरती है इसलिए दशहरा कहलाती है। गंगा जब पृथ्वी पर आयी थी, उस समय ज्योतिष के अनुसार दस योग थे — ज्येष्ठ का महीना था, शुक्ल पक्ष था, इसी प्रकार दसमीं तिथि, मंगलवार, हस्त नक्षत्र,व्यतीपात, गर करन आनंद योग, कन्या राशि में चंद्र, और वृश राशि में सूर्य थे। आरंभ में यह पर्व दशाश्वमेध-घाट पर गंगा स्नान, पूजन और दान से संवंधित था, किंतु धीरे धीरे यह किसी भी बड़ी नदी में स्नान दान से मनाया जाने लगा है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी कहते हैं इसी दिन भगवान राम ने लंका के राजा रावण पर विजय पायी थी जिसकी स्मृति में प्रतिपदा से दशमी — इन दस दिनों तक भारत भर में और विदेशों में भी रामलीलाएं होती है और दशमी को रावण की आकृति जलायी जाती है। जो परम्परा का रूप ले चुकी है। पूज्य गुरुदेव भगवान ने कहा कि एक परमात्मा को विदित करने के लिए यथार्थ गीता को पढ़ें उसके बताये मार्ग पर चलें। ओम् जप करें सद्गुरु का ध्यान करें और जब सद्गुरु कृपा से भगवान् हृदय से रथी हो जांय तो उनके आदेश में यंत्रवत परमात्मपर्यंत की दूरी तय होने तक चलते रहे।






