वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव” की रिपोर्ट
सात वचन- सात फेरे- सात जन्मों के रिश्ते को दागदार करता प्रेमी-प्रेमिका वायरस
“*प्रेमी- प्रेमिका एक वायरस है, यह एक क्षणिक सुख और हबस का परिणाम है, यह ह्दयात्मक नहीं पूर्णरूपेण वासनात्मक होता है, यह पवित्र पति-पत्नी के अटूट रिश्ते को दागदार कर रहा है इसे जड़ से मिटाने की जरूरत है”*

प्रेमी – प्रेमिका एक वायरस है। प्रेमी को संतुष्ट करने में पत्नियां पति को मौत के घाट उतार दे रहीं हैं जिस हद तक जाना हो उस हद तक चली जा रही हैं। प्रेमी – प्रेमिका की युगल अपनी हबस को पूरा करने के लिए कहीं पति को मारकर सांप लिटा दे रहे हैं तो कहीं ड्रम में डालकर सीमेंट के घोल में पति को जमा दे रहीं हैं तो कहीं हनीमून के बहाने पति का काम तमाम कर दे रहीं हैं और भविष्य में ये अपना कौन -कौन सा रुप दिखाएंगी वो भविष्य के गर्भ में है। प्रेमी – प्रेमिका के हबस की भूख धीरे- धीरे अपराध की दुनिया में जहां एक तरफ पुलिस के लिए सरदर्द बन रही हैं तो वहीं समाज में स्थायित्व ले चुके मानवीय मूल्यों के ह्वास का कारण बन रही है। ऐसे हृदय विदारक जघन्य कारित घटनाओं से समाज स्तब्ध और सशंकित है। इन हत्याओं ने पवित्र पति-पत्नी के रिश्तों में विषाक्तता की लहर से समाज को भयभीत कर दिया है। प्रेमी – प्रेमिका युगल के हबसी स्वार्थ के आगे पति-पत्नी के पावन प्रेम सात जन्मों का साथ , सात फेरे, और सात वचन सब फीके पड़ रहे हैं। अनादिकाल से हमारी सांस्कृतिक पहचान रही है कि विवाह के समय वर – वधू द्वारा सात वचनों के साथ लिए गये सात फेरे सात जन्मों तक चलता है जो सौ वर्ष के लंबी आयु को अनुशासित करने के सोलह संस्कारों का एक अंग है । हमारी संस्कृति में तलाक, ड्राइवोर्स जैसे पति-पत्नी के पाक रिश्ते को अपवित्र करने वाले शब्द नहीं थे। तलाक मुस्लिम तहजीब और ड्राइवोर्स इंग्लिश कल्चर है। सनातनी संस्कृति में ये शब्द नहीं है।
वर – वधू द्वारा सात वचनों के साथ लिए गये सात फेरे सात जन्मों तक की चाभी का संस्कार पुरोहित द्वारा भर दिया जाता था। वर – वधू द्वारा लिए गए सात वचनों में वर द्वारा वधू को दिये गये ये सात वचन है कि वर वधू को तीर्थ यात्रा और धार्मिक कार्यों में अपने साथ शामिल करेगा, वर- वधू के माता-पिता का सम्मान और पारिवारिक मर्यादा का पालन करेगा, वर वधू के जीवन के हर चरण में समर्थन करेगा, वर पूरी निष्ठा से पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करेगा, वर पारिवारिक संपत्तियों व परिवार का देखभाल करेगा, वर हर परिस्थिति हर मौसम में वधू के साथ रहेगा, वर वधू के साथ आजीवन रहेगा और उसे खुश रखेगा । इतना ही नहीं पौराणिक कथाओं में ऐसे तमाम पवित्र पति-पत्नी के रिश्तों से आलौकिक शक्तियों के अर्जन का उदाहरण मिलता है। माता सीता, माता अनुसुइया, माता पार्वती, माता जालिपा जैसी आदर्श धर्मपत्नियों के चमत्कार से वेद वेदांग गौरवान्वित हो रहे हैं। लेकिन आज ये गौरवान्वित करने वाले रिश्ते प्रेमी- प्रेमिकाओं के वायरस से दागदार हो चुके हैं। ये सब वैश्वीकरण आधुनिकीकरण मोबाइल टीवी इत्यादि का परिणाम है। दुनिया की अंधी भाग दौड़ में बच्चों को गार्जियन समय नहीं दे पा रहा है । हमारी उपभोग वादी संस्कृति भोगवादी संस्कृति में एंट्री कर चुकी है। हमारी पुरातन और गौरवमई सांस्कृतिक
विरासत युवाओं को वैश्वीकरण के भागम- भाग अमर्यादित तुफान में जाने से नहीं रोक पा रहे हैं और न ही सरकार इस पर कोई ठोस कदम उठा पा रही है। पूरी दुनिया हमारी कल्चर की तरफ सकारात्मकता के साथ देख रहा है। इजरायल जापान चीन कोरिया इत्यादि जैसे देश के नागरिक दुनिया में कहीं भी रहें वे अपनी संस्कृति नहीं भूलते। आज हमारे देश के युवाओं का अपनी संस्कृति के प्रति उदासीनता का परिणाम है कि आज प्रेमी- प्रेमिका वायरस समाज को गंदा कर रहे हैं। प्रेमी – प्रेमिका वायरस एक क्षणिक सुख व क्षणिक हबस का परिणाम है। यह ह्दयात्मक नहीं बल्कि पूर्णरूपेण वासनात्मक होता है यह सामाजिक मर्यादाओं से परे खुद के कुंद सनकी विवेक से प्रस्फुटित असामाजिक कामवासना का जहर होता है जो न केवल पति – पत्नी समेत पूरे परिवार को बल्कि खुद के परिवार को तबाह और बर्बाद कर देता है। यह एक ऐसा जहरीला वायरस है जिसके बीज का अंकुरण कई पीढ़ियों तक खत्म नहीं होता। वर्तमान में पुलिस और समाज के लिए यह सरदर्द बना हुआ है। इस वायरस को खत्म करने के लिए हमें आगे आना होगा। अभिभावकों, शिक्षकों, स्वंयसेवी संगठनों, सरकार, समाज के बुद्धिजीवी वर्गों इत्यादि के माध्यम से हमें एक अभियान चलाना होगा । “वेदों की ओर लौटो” स्वामी दयानंद सरस्वती ने और “गीता की ओर लौटो” स्वामी विवेकानंद ने भारतीय युवाओं को पश्चिमी कल्चर से भारतीय कल्चर की तरफ मुड़ने के लिए नारा बुलंद किया था। इसलिए आज हमें भी भारतीय युवाओं को वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ से रोककर उन्हें पुरातन समृद्धशाली भारतीय सांस्कृतिक विरासत की तरफ आकर्षित करना होगा। हमें आधुनिकता अपने आचरण, स्वतंत्र जीवनशैली और मर्यादा में नहीं लाना है बल्कि उपभोग में, जीवन स्तर के उत्तरोत्तर वृद्धि में, अत्याधुनिक सुविधाओं के अनुप्रयोग में लाना है। आखिर एक नजर डालिए हमें दुनिया क्या सिखायेगा? हम विश्व गुरु रहे हैं महर्षि वेदव्यास महर्षि वाल्मीकि कृत रचनाओं की पंक्तियां/ श्लोक आज भी प्रासांगिक हैं । वेद- वेदांग के अध्ययन से ही दुनिया के वैज्ञानिक शोध कर नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर रहे हैं। हजारों वर्षों पहले अनादिकालीन ऋषि-मुनियों की पवित्र शोध पर आज दुनिया रिसर्च कर रही है। दुनिया ने हमारे अनादिकालीन ऋषि-मुनियों के आध्यात्मिक ज्ञान का जब – जब परीक्षा लिया है तो भारत उन परीक्षाओं में पास हुआ है। 1893 के शिकागो धर्म सम्मेलन इसका ज्वलंत उदाहरण है। स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज कृत यथार्थ गीता आज पूरी दुनिया पढ़ और सीख रही है। आज दुनिया की सारी सभ्यताओं पर ग्रहण लग गया लेकिन हड़प्पा सभ्यता आज भी पुनर्जीवित है। हमारा देश तो खुद ही विविधताओं का देश है उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम बोली -भाषा, वेष -भूषा, रहन – सहन, खान – पान हर मामले में विविध और समृद्ध है। नागा संस्कृति हमारे देश की है दुनिया में कही जाओ तो थोड़ा ही नंगें मिलेगे और यहां नांगा है तो पूरे नंगे ही रहते हैं। पूरी दुनिया की संस्कृति का हब है भारत। इसलिए अपनी सांस्कृतिक समृद्धशाली विरासत को अपनाओं उसी में रच-बस जाओ और उसी में जीओ। प्रेमी प्रेमिका के वायरस को खत्म करें पति-पत्नी के पावन बंथन को समृद्धशाली बनायें।






