समय के विपरीत बंद मिली बी-पैक्स समिति, किसानों को हुई भारी परेशानी
धान भंडारण में लापरवाही और जर्जर भवन बन सकता है दुर्घटना का कारण
अंबेडकरनगर।
जनपद के रामनगर विकासखंड अंतर्गत बहुउद्देशीय प्राथमिक ग्रामीण सहकारी समिति (बी-पैक्स) इंदईपुर सोमवार को अपने निर्धारित समय के विपरीत दोपहर लगभग एक बजे बंद पाई गई। जबकि समिति के बाहर स्पष्ट रूप से कार्य समय प्रातः 9:00 बजे से सायं 5:00 बजे तक अंकित है। समिति के बंद होने से खाद एवं अन्य कृषि सामग्री लेने आए किसानों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा और वे निराश होकर लौटने को मजबूर हुए।
समिति के सूचना बोर्ड पर अंकित सचिव के मोबाइल नंबर पर संपर्क का प्रयास किया गया, किंतु कई बार कॉल करने के बावजूद फोन रिसीव नहीं किया गया। बिना किसी पूर्व सूचना के समिति का बंद रहना न केवल किसानों के हितों के विपरीत है, बल्कि सहकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है।
धान भंडारण में गंभीर लापरवाही
समिति द्वारा किसानों से खरीदे गए धान के भंडारण में भी गंभीर लापरवाही सामने आई है। धान को पूरी तरह ढककर सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं की गई, जिससे बारिश अथवा नमी की स्थिति में धान के खराब होने की आशंका बनी हुई है। यदि धान क्षतिग्रस्त होता है, तो इसका सीधा आर्थिक नुकसान किसानों और सरकारी राजस्व—दोनों को उठाना पड़ सकता है।
जर्जर भवन, बढ़ता खतरा
बी-पैक्स समिति का भवन अत्यंत जर्जर अवस्था में है। दीवारों में दरारें, छत की खराब स्थिति तथा जगह-जगह से गिरता प्लास्टर किसी भी समय बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण दे सकता है। इसके साथ ही समिति परिसर में साफ-सफाई का घोर अभाव देखा गया, जिससे कर्मचारियों की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि समिति में नियमित रूप से सफाई नहीं कराई जाती, जिससे भवन की स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। यदि समय रहते भवन का जीर्णोद्धार नहीं कराया गया, तो किसी अप्रिय घटना से इनकार नहीं किया जा सकता।
किसानों ने की कार्रवाई की मांग
क्षेत्रीय किसानों और ग्रामीणों ने सहकारी विभाग के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि
समिति के अनियमित संचालन की जांच कराई जाए,
जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए,
धान भंडारण की सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए,
तथा समिति भवन का शीघ्र जीर्णोद्धार कराया जाए।
किसानों का कहना है कि सहकारी समितियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि ऐसी संस्थाएं ही लापरवाही का शिकार होंगी, तो किसानों का भरोसा व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है






