संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
वृत्ति रूपी बहन भाव रुपी भाई में बंध जाए, सद्गुरु योगक्षेम करने लगे यही है रक्षाबंधन — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

हर त्योहार किसी न किसी महापुरुष के नाम पर होता है जिसमें उनके त्याग तपस्या साधना बलिदान आदि महिमा का गायन है *जिससे भविष्य उनके पदचिन्हों पर चलकर उन्हीं जैसा धर्म की स्थापना करे और संसार का कल्याण करे। इसी तरह भाई-बहन के बीच अटूट रिश्ते का त्योहार रक्षाबंधन एक पवित्र पावन पर्व है। जो श्रावण मास की पूर्णिया तिथि पर पड़ता है। इस दिन बहनें पूजा-अर्चना कर भाइयों की कलाइयों पर राखी बांधती है। भाई उसे हर तरह से रक्षा- सुरक्षा की गारंटी देता है। ये है बाह्य दृष्टिकोण। इसका आध्यात्मिक स्वरूप कुछ और ही है। जो बेचारा अपनी रक्षा नहीं कर पाता है वो बहनों की कैसे रक्षा करेगा? जो खुद भयभीत है, वह बहन को कैसे अभय प्रदान करेगा? अभय एकमात्र सत्ता परमात्मा है। वही अभय प्रदान कर सकता है। रक्षाबंधन की शुरुआत सतयुग में हुई थी । महान दानी महाराज बलि वामन रूप में दान मांगने आये भगवान विष्णु को मनचाहा दान देकर उन्हें प्रसन्न करके उन्हें अपना चौकीदार बना लिया था।जिसे मां लक्ष्मी ने भक्त बलि को रक्षा बांध कर भगवान विष्णु को महाराज बलि के बंधन से मुक्त कराया था। रक्षाबंधन का प्रमाण द्वापर युग में भी मिलता है शिशुपाल बध के समय भगवान श्री कृष्ण की अंगुली में चोट आने से खून टपकने लगा था तब बहन द्रोपदी ने अंगुली से बहते हुए खून को बंद करने के लिए अपनी साड़ी फाड़कर चोटिल अंगुली पर बांधा और खून रुक गया । तभी भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का संकल्प लिया था। भाई-बहन के इस पवित्र प्रेम के इस त्योहार का इतिहास मुगल बादशाह हुमायूं ने भी निभाया। राजपूत रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को सेठ पद्मशाह से राखी भिजवायीं और जिसकी लाज रखने के लिए हुमायूं ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ा था। फिलहाल हमारे आस-पास जो भी त्योहार गुजरते हैं वे किसी न किसी महापुरुषों से संबंधित रहते हैं और उनका एक आध्यात्मिक अर्थ भी होता है।* अब जैसे रक्षाबंधन को ही लें। यथार्थता जो हमें रक्षासूत्र बांधना चाहिए वो हमे ब्रम्ह में स्थित जो महापुरुष हैं उनके चरणों में बांधना चाहिए। *जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।। सबके ममता ताग बटोरी। मम पद मनहिं बांधि बर डोरी।।* *रक्षासूत्र महापुरुष के चरणों में बांधना है फिर बंधन जो जनम- मरण का, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद, मत्सर इत्यादि माया का है जिसके कारण जीव बंधा हुआ है जन्म-जन्मांतर से उसके उद्धार का रास्ता यही है कि वह तन- मन धन से मनसा वाचा कर्मणा से सद्गुरु के चरणों से बंध जाए । यह मानव तन है। विष की बेलरी है सिद्धांत होना चाहिए खुद की मुक्ति का। संसार में जो हमारी कृत्य हैं जो ममत्व है उस ममत्व के धागे को, रक्षासूत्र को ब्रह्म में स्थित महापुरुष के चरणों में बांधना चाहिए। ममता इन्हीं महापुरुष के चरणों में लगाना है इससे धीरे-धीरे हमारा जो बंधन है जो माया का, काम क्रोध लोभ मोह आदि का इससे हमें धीरे-धीरे निवारण मिलेगा। जो महापुरुष बंधनों से मुक्त है वही हमको बंधनों से मुक्त करा सकते हैं और जो बंधन से खुद बंधा है वह दूसरो को मुक्त क्या करेगा? वही जो ममत्व के धागे हैं हमारे मन का इंटरनल अटैचमेंट है। मोह जिसको कहते हैं यही हमारे दुख का कारण है और इसी से रक्षा करना है । तो बंधन माने क्या होता है? जिससे हम बंधे हैं बंधे हम किससे है? बेटा- बेटी, हित-नात, यार -दोस्त इत्यादि से सब इसी शरीर के रिश्ते हैं बंधन है* और जन्म-जन्मांतर तक का इसी प्रकार बंधन रहा है और इन्हीं से हमें मुक्ति लेना है इस मानव तन से। जैसे रोग होता है मानस रोग, ये मन का रोग है काम क्रोध लोभ आदि से जीव बंधा हुआ है — *मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्वग्य कृपा अधिकाई। मोह सकल व्याधिन कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।। काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित नित छाती जारा।। प्रीति करहिं जौ तीनिउ भाई। उपजी सन्यपत्त दुखदाई।। विषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।।* और ऐसे समर्पण वृत्ति बहन की प्रतीक है तो बहन लोग बांधती है भाई को राखी। भाव ही भाई है भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि- *तेषामहं समुद्भवां मृत्यु संसारसामरात। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतिसाम ।।* केवल मुझमें चित्त लगाने वाले उन भक्तों का मैं सीध्र ही मृत्यु रूपी संसार सागर से उद्धार करने वाला होता हूं। *अनन्याश्रिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानं योगक्षेम वहाम्यहम।।* अर्थात अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरंतर चिंतन करते हैं, लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते है उन नित्य एकीभाव से संयुक्त हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं अर्थात ?, उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में ले लेता हूं। *मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोअ्सि मे।।* अर्थात हे अर्जुन। मेरे में ही मन वाला हो। शिवाय मेरे दूसरे भाव मन में न आने पाये। मेरा अनन्य भक्त हो, अनवरत चिंतन में लग। श्रद्धा सहित मेरा ही निरंतर पूजन कर और मेरे को ही नमस्कार कर इसी प्रकार मेरी शरण हुआ आत्मा को मुझसे एकीभाव से स्थित कर तू मुझे ही प्राप्त होगा*। *हमारी बहन रुपी वृतियां भाव रूपी भाई में बंध जाए।* यही है बंधना भगवान के शरण में हो जाओ। भगवान को ही निमित्त बना के घर-परिवार बीबी बच्चे सब में परमात्मा का स्वरूप है जो ज़िम्मेदारियां मिली हैं उस जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना है मुंह नही मोड़ना चाहिए। इसलिए उसको देखते हुए भगवान का स्मरण ध्यान सुबह-शाम एक घंटे भगवान को समय देना चाहिए। नाम जप में सुमिरन में कहीं नजदीक में महात्मा हों उनकी सेवा करनी चाहिए। धीरे-धीरे भाव बढ़ता जाएगा। इसलिए *गुरु पद पंकज सेवा तीसरी भक्ति अमान। गुरु पद पंकज सेवा प्रथम भगति संतन कर सेवा* इसलिए संतों की शरण में जाओ टूटी-फूटी सेवा करो *धीरे-धीरे गुरु की पहचान होने लगेगी जब गुरु मिल गये तो कुछ भी संशय नहीं फिर गुरुदेव भगवान की कृपा से साधना भजन चालू हो जाएगा फिर वो हृदय से रथी हो जायेंगे साथ नहीं छोड़ेंगे। पूर्तिपर्यंत साथ रहेंगे। रक्षा और बंधन वृत्ति बहन की प्रतीक है हम अपनी वृत्ति को अपने भावों के साथ जोड़े।* *सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते।।१८-६५* *सत्य के प्रति भाव हो साधु भाव हो साधना में लगा हुआ भाव। तो साधना क्या है? जहां भी मन का हमारा संपर्क है वहां से मन को हटा करके डिस्कनेक्ट करके गुरु के चरणों में लगाना है बांधना है। इससे क्या होगा? इससे हमारी रक्षा होगी हमारा योगक्षेम भगवान खुद करेंगे। उनके हाथ में बागडोर आ जाएगी। रक्षा किसकी करना है? शरीर गल रही है क्या? किसकी रक्षा करना है? जिस दिन संस्कार पूरा हो गया राम नाम सत्य है मौत न ज़वानी देखेगी न बुढ़ाई देखेगी न बालपन जिस दिन संस्कार पूरा हुआ, संस्कारों के आधार पर शरीर टिका हुआ है उसी दिन हम टपक जाएंगे। हमें अपनी वृत्ति को जीवात्मा की जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति के मार्ग के लिए मानव का तन मिला है। अभी इसकी सार्थकता न समझो तो भोग-विलास की तरफ भटकों मौज करो *अबकी पासा न पड़ा तो लख चौरासी जाए* किसी जन्मों की पूजी से आज जो सुख मिल रहा है उसका आनन्द ले रहे हो वैसे ही शरीर है दोनों तरफ जाएगा।* *पच्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम* १८-१३।। संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए पांच कारण संख्या सिद्धांत में कहे गए हैं। *अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्ठा दैव चैवात्र पंचमम।।* *यदि शुभ पार लगता है तो विवेक वैराग्य शम दम त्याग तितिक्षा अनवरत चिंतन की प्रवृत्तियां इत्यादि कारण होंगी संत महात्मा भक्त आदि अच्छा लगेगा और यदि अशुभ पार लगता है तो काम क्रोध राग द्वेष लिप्सा इत्यादि कारण होंगे तो माया आदि अच्छा लगेगा। महात्मा में कमी दिखने लगेगा विकार हावी होने लगेंगा । इसी प्रकार से ये रक्षाबंधन सूत्र त्योहार में रक्षाबंधन। रक्षा किसकी करना है बंधने से, एक पारिवारिक बंधन से। परिवार क्या है! मोह है मन से भी ये बंधन छूट जाएगा। दादागुरु कहते थे कि साधु होना और मरना बराबर है। पूर्ण सत्ता है परमात्मा। जो माया मोह के बंधनों से मुक्ति दिलाता है उन्हीं के चरणों से हमें बंधना है।*






