वाराणसी ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ से यथार्थ गीता पाठ पर संतों का आगमन
वाराणसी के जन्शा थानांतर्गत हाधी बरनी में भक्त शिवप्रकाश मौर्य के घर यथार्थ गीता पाठ में पहुंचे संत
बिनु सत्संग विवेक न होई,। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभी बजावहिं।।

विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष अनंत विभूषित करूणा निधान दया के अथाह सागर परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के आदेशानुसार यथार्थ गीता पाठ व भंडारे में श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ से संतों का आगमन हुआ। सभी समर्पित भक्तों ने उन संत -महात्माओं का दर्शन पर्सन किये, उनकी सेवा किये और उनकी अमृतवाणी को श्रवण कर अपने आप को कृतार्थ किये । श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ से पधारे संत श्री लाले महाराज जी ने सत्संग के दौरान अपने उद्बोधन में बताये कि धर्म- शास्त्र और शास्त्र को कैसे समझा जाए,? शास्त्रों को कैसे आत्मचिंतन में ढाला जाए? उसकी विधि क्या है ? और शास्त्र को यदि ह्दयांगम करने लगे तो उसका परिणाम क्या होगा? उन्होंने बताया कि शास्त्र कोई विरले महापुरुष ही जानते हैं और उनके संरक्षण में रहने वाले कोई विरला ही पथिक शास्त्र के अनुसार आत्मचिंतन में प्रवृत्त हो पाता है क्योंकि मन सहित इंद्रियों का संयम करना इतना आसान नहीं होता । उन्होंने कहा कि शरीर से परे इंद्रियां है इंद्रियों से परे मन है मन से परे बुद्धि है बुद्धि से परे जो आत्मा है उसी के आत्मचिंतन में सबको प्रवृत होना है। और आत्मचिंतन में प्रवृत्त होने के लिए भेद-भाव छुआ-छूत छुटकारा पाना होगा और एकता के सूत्रपात में सभी बंध जाएंगे ईश्वरीय राह पर चलने लगेंगे,। संत श्री
वरिष्ठानंद जी महाराज ने बताया कि जब तक हनुमान की तरह दृढ़तापूर्वक नहीं लगेंगे तब तक कल्याण संभव नहीं है। हठ ही हनुमान है और हनुमान जी की ही तरह जब तक पूर्ण वैराग्य अंतःकरण में नहीं आयेगा तब तक संसार रूपी सागर से पार कदापि नहीं हो सकते। उन्होंने बताया कि वैराग्य ही हनुमान है और देखी सुनी हुई विषय वस्तुओं में राग का त्याग हो जाए यही वास्तविक वैराग्य है संसार में हम जो कुछ देख रहे हैं जो कुछ सुन चुके हैं जो कुछ क्रियाकलाप कर लिये हैं उसी में राग है अर्थात आसक्ति है उस आसक्ति का त्याग हो जाना वही वास्तविक वैराग्य है और ज्यों- ज्यों वैराग्य में चलेंगे तो धीरे-धीरे संसार से त्याग होता जाएगा और भगवतपथ में प्रवृत्त होते जाएंगे और उन्होंने कहा कि एक ईश्वर का जप ज्यों- ज्यों करते जाएंगे संसार से पार होते जाएंगे । उन्होंने बताया कि परमात्मा की खोज में संसार मंदिर -मस्जिद पेड़- पौधे पथरा -पानी में भटक रहा है लेकिन वो परमात्मा सबके ह्रदय में है उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण गीता में बताएं है कि- *ईश्वर: सर्वभूतानां हृदशेअर्जुन तिष्ठंति । ब्रम्हायन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया।।* —- अर्थात ईश्वर का निवास स्थान सबका हृदय है । अब प्रश्न उठता है कि जब हृदय में भगवान है तो दिखाई क्यों नहीं देते ? तो उन्होंने बताया कि माया में आरूढ़ हो कर लोग भ्रमवश संसार में भटकते रहते हैं इसलिए नहीं देख पाते । उन्होंने बताया कि हृदयस्थ ईश्वर को देखने के लिए अनन्य भाव से एक परमात्मा का चिंतन करना होगा, ओम् अथवा राम नाम का जप करना होगा तत्वदर्षी महापुरुष के चरणों में लगना होगा तब जाकर उनके आश्रित होकर हृदयस्थ ईश्वर को पा पायेंगे। एक न एक दिन परम पद की प्राप्ति कर पायेंगे। संत श्री संजयानंद जी महाराज ने बताया कि एक परमात्मा के भजन के बिना कल्याण कदापि नहीं और उनका कहना था कि परमात्मा की खोज हम बहिर्मुखी वृत्तियों से नहीं कर पायेंगे उसके लिए हमें पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी की कृपा से अंतर्मुखी होना पड़ेगा। हमें
अंतःकरण के विकारों को काटना होगा। काम क्रोध लोभ मोह मद और मत्सर यही षडविकार ही हमारे शत्रु है इनको मारने के लिए हमें सत्गुरु के छत्रछाया की जरूरत है। सत्संग के समापन पर भक्त शिवप्रकाश मौर्या जी के द्वारा धर्म- शास्त्र यथार्थ गीता हजारों भक्तों श्रद्धालुओं में वितरित किया गया और सभी भक्तों को भोजन- प्रसाद की व्यवस्था की गयी । और संतों का दर्शन-पूजन कर सभी भक्तों ने अपने आप को कृतार्थ किये। उक्त भक्तिमय कार्यक्रम को पूज्य श्री गुरुदेव भगवान की कृपा से सफल बनाने में हरसोस के भक्त महेन्द्र केशरी भक्त कैमरा मैन सोनू राय भक्त नीलेश राय, भक्त शिवम सिंह का विशेष योगदान रहा।






