देहरादून ब्यूरो वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
माध्यम सद्गुरु और लक्ष्य परमात्मा का होना चाहिए — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
प्रकृति के गोंद में ऊची पहाड़ियों में स्थित श्री परमहंस आश्रम कोडारमा देहरादून में अपने आध्यात्मिक प्रवास के दौरान विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष अनंत विभूषित करूणा निधान दया के अथाह सागर परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने बताया कि लक्ष्य एकमात्र परमात्मा को विदित करने के लिए माध्यम सद्गुरु का लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि सद्गुरु खेवनहार होते हैं, परमात्मा के मार्ग प्रशस्त करने का एक सेतु होते हैं जब तक सद्गुरु की कृपा नहीं होगी तब तक परमात्मा विदित नहीं होंगे। उन्होंने बताया कि महाभारत युद्ध को फतह शिष्य अर्जुन ने सद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण की ही कृपा से किया। अमेरिका के शिकागो धर्म सम्मेलन में विश्व गुरु की उपाधि भारत को स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु महाराज स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कृपा से दिलायी। इसलिए बिना सद्गुरु की कृपा से भव- सागर को पार नहीं किया जा सकता। पूज्य श्री गुरुदेव ने बताया कि सद्गुरु की कृपा से ही शिष्य के हृदय में युग- प्रवर्तन होता है। युग भी साधना के चार सोपान है ये हैं कलयुग त्रेता द्वापर और सतयुग। कलयुग भगवतपथ की आरंभिक सोपान है अचेत आत्मा के जाग्रति होते ही यह आत्मपथ का पहला चरण है तामसी गुणों के बाहुल्य के कारण ऐसा साधक संत सद्गुरु की सेवा और भगवान के गुण गायन से ही कलि का पार पाकर अंतर्मन में जितने भी संकल्प आये यदि शरीर से भूल न हो विकारों को कार्यरूप न दें तो पाप नहीं लगता किंतु मन से ही सही यदि वह सत्पथ का संकल्प लेता है तों उसका पुण्य होगा क्योंकि उसी पथ में ही तो लगा था किंतु जब यही साधक तीसरी या चौथी श्रेणी में पहुंच जयेगा तो संकल्प मात्र से पाप होने लगता है और उसका प्रायश्चित करना पड़ता है । पूज्य श्री गुरुदेव भगवान ने बताया कि यथार्थ गीता घर – घर, और संसार के हर हाथ में होना चाहिए जिससे भटकाव खत्म हो जाय और परमात्मपथ का सन्मार्ग मिल जाए।







