संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यौगिक शब्दावली है न कि कोई जाति — स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जैसे पवित्र यौगिक शब्दावली को कुछेक तत्समय के प्रबुद्ध वर्ग अपने आप को जन्मजात श्रेष्ठता दिखाने और अनंतकाल तक अपने से अल्पज्ञ वर्ग पर राज करने के दृष्टिगत इस यौगिक शब्दों से विभूषित हो कर तरह- तरह से अपमानित किये और खुद अपमानित हुए। जिसकी वजह से विदेशी आक्रांताओं ने तत्समय के विघटनकारी जातियों का लाभ उठा कर हजारों वर्ष तक पूरे भारत पर राज किया। हखामनी आक्रमणकारियों, हूणों, मुगलों, डच, अंग्रेज आदि तक सबों ने मिलकर हजारों वर्षों तक भारत पर राज किया। विनाशकारी जातीय दुर्दशा भारत आज 21 वीं सदी में भी झेल रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे पवित्र यौगिक शब्दावली से विभूषित वर्गों के लोग कहीं किसी के ऊपर पेशाब कर देते हैं तो कहीं चोटी काट लेते हैं तो कहीं उन्हें छुआ-छूत मानकर उन पर तरह- तरह के अत्याचार करते हैं। उन्हें अनादि काल से लेकर आज तक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक अवहेलना का शिकार होना पड़ रहा है। दुनिया को ज्ञान सिखाने वाला भारत आज जातियों के विष्लेषण में लगा हुआ है। यहां के बुद्धिजीवी वर्ग प्रोफेसर , राजनेता, आदि तुलसी कृत चौपाइयों पर लड़ जाते हैं। जबकि तुलसी दास के शब्दों में *”जानहिं यह “चरित्र” मुनि ज्ञानी”। जिन्ह रघुवीर चरन रति मानी।।* अर्थात श्रीरामचरित मानस का अर्थ कोई विरला मुनि ज्ञानी ही समझ पाता है न कि कोई अन्य। समय के महापुरुष वर्तमान में यथार्थ गीता के आलोक से पूरे विश्व को आलोकित करने वाले विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म -शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि शास्त्र कोई विरला महापुरुष लिखता है और कोई विरला महापुरुष ही उसको समझता है या उसके शरण सानिध्य में रहकर भजनानंदी उनका शिष्य ही समझता है। इसी तरह उन्होंने बताया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र यौगिक शब्दावली है, साधना के क्रमोन्नत सोपान का नाम है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। अर्थात महापुरुष के शरण सानिध्य में रहकर कठोर तपस्या करने वाले तपस्वी की भजन के आधार पर उनकी श्रेणियों का नाम है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र। अर्थात इन श्रेणियों का आविष्कार इजाद महापुरुषों द्वारा पोषित सेवित तपित अपने शिष्यों के लिए है न कि किसी सद्गुरु घराने के बाहर अन्य किसी संसारी के लिए। यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में चौथे अध्याय के तेरहवें श्लोक में कहा है। चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्वयकर्तारमव्ययम्।। अर्थात हे अर्जुन चारो वर्णों की रचना मैंने गुणकर्म के आधार पर की है अर्थात जैसे नये साधक की प्रवेशिका में मन भजन में अल्प समय तक ही टिकता है । भजन में बैठा ऐसा अल्पज्ञ साधक का मन हवा में बात करता है। तो ऐसे नवीन प्रवेश वाले साधक को *”परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम”* । अर्थात जो महापुरुष अव्यक्त की स्थितिवाले हैं, अविनाशी तत्व में स्थित हैं उनकी तथा इस पथ पर अग्रसर अपने से उन्नत संतों की सेवा में लग जाओ । इससे दूषित संस्कारों का शमन और साधना में प्रवेश दिलाने वाले संस्कार सबल होते जाएंगे। क्रमशः ऐसे सेवा से उस शूद्र श्रेणी के साधक के तामसी गुण न्यून होने पर राजसी गुणों की प्रधानता तथा सात्विक गुण के स्वल्प संचार के साथ साधक की क्षमता वैश्य श्रेणी की हो जाती है। उस समय वही साधक इंद्रिय- संयम, आत्मिक संपत्ति का संग्रह स्वभावत: करने लगता है। अराधना करते – करते उसी साधक में सात्विक गुणों का बाहुल्य हो जायेगा, राजसी गुण कम रह जाएंगे, तामसी गुण शांत रहेंगे। उस समय वही साधक क्षत्रिय श्रेणी में प्रवेश पा लेगा। शौर्य कर्म/ अराधना में प्रवृत्त रहने की क्षमता, पीछे न हटने का स्वभाव, सब भावो पर स्वामिभाव , प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता उसके स्वभाव में ढल जाएगी। वही कर्म/अराधना और सूक्ष्म होने पर मात्र सात्विक गुण कार्यरत रह जाने पर मन का शमन, इंद्रियों का दमन, एकाग्रता, सरलता, ध्यान ,समाधि, ईश्वरीय निर्देश आस्तिकता इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलाने वाली स्वाभाविक क्षमता के साथ वही साधक ब्राम्हण श्रेणी का कहा जाता है। जब वही साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है उस अंतिम सीमा में वह स्वयं में न ब्राम्हण रहता है, न क्षत्रिय, न वैश्य, न शूद्र; किंतु दूसरे के मार्गदर्शन हेतु वही ब्राह्मण है। तो पूज्य श्री गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज कहते हैं कि शूद्र, वैश्य ,क्षत्रिय और ब्राम्हण की श्रेणियां इन्हीं अराधना/ कर्म के आधार पर इनका योग्यता के आधार पर वर्गीकृत है, यही यौगिक शब्दावली है। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण, महर्षि वेदव्यास, महर्षि वाल्मीकि , माता शबरी, कबीर, रैदास आदि महापुरुषों की लंबी श्रृंखला है जिन्हें संसार नीच कुलोत्पन्न जानता है लेकिन हैं वो सर्वोपरि ब्राम्हण सर्वोपरि महापुरुष, जिनका अनुसरण आज भी संसार कर रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा। ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की व्याख्या जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण की निसृत वाणी गीता में है ठीक उसी तरह ऋग्वेद में भी है । दूसरा उदाहरण देखें ऋग्वेद संहिता मंडल 10 , सूक्त 90, ऋचा 12 में उल्लिखित – ब्राम्हणोंअ्स्य मुखमासीद्वाहु राज्य; कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पदभ्यां शूद्रो अजायत:।।
अर्थात श्रृष्टि के रचनाकार ब्रम्हा के मुख से ब्राम्हण, भुजाओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और चरणों से शूद्र की उत्पत्ति हुई। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि क्या वर्तमान में कोई नान बायोलाजिकल पैदा हुआ है? अर्थात सभी बायोलाजिकल ही पैदा हुए हैं चाहे भगवान हो या भक्त हों वैज्ञानिक हों या संत सब के सब मां के गर्भ से ही पैदा हुए हैं। अब जरा गौर करें ऋग्वेद की ऋचा पर। महापुरुष हमेशा अध्यात्म के गूढ रहस्यों को छुपा कर कहे हैं। मुख, भुजा, जांघ और चरण की बातें प्रतीकात्मक है। ऋग्वेद की इस ऋचा में उल्लिखित चार वर्ण भी यौगिक है। अब चरण से शूद्र पैदा होने का अर्थ है अल्पज्ञता। भगवान शिव के चरण से गंगा जी निकली जिसमें निशदिन स्नान करके संसार पवित्र हो रहा है। अल्पज्ञ साधक के गुरु घराने की प्रवेशिका में सर्वप्रथम महापुरुष की चरण सेवा में उसे लगाया जाता है। गुरुदेव भगवान के चरणों का ध्यान – वंदन के लिए उसे संस्कारित किया जाता है। “श्री गूरु पद नख मनि गन ज्योति। सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती।।” बाह्य दृष्टि से देखें तो चरण शरीर का सबसे निचला हिस्सा होता है लेकिन सभी आशीर्वाद चरण ही छू कर लेते हैं। चरणों की महिमा में “चरण रज” “चरण स्पर्श” “चरणों में लेटना” “चरणों का ध्यान” “चरणों की वंदना” इत्यादि कहकर चरण के महत्व को बताया गया है जिसे अल्पज्ञ शूद्र श्रेणी का साधक सेवा करके वैश्य श्रेणी में गमन कर जात है। जंघा मजबूती का प्रतीक है। साधना की उत्तरोत्तर वृद्धि से दैवीय शक्तियों का अर्जन कर अल्पज्ञ शूद्र साधक मजबूत होकर वैश्य श्रेणी में पहुंच जाता है और साधना के क्रमोन्नत सोपान से वह धीरे-धीरे क्षत्रिय श्रेणी में पहुंच जाता है । भुजा कार्यक्षेत्र का प्रतीक है शौर्य का प्रतीक है।
विकारों (षडविकार) को काटने की क्षमता आ जाती है, यही है भुजा से क्षत्रिय का पैदा होना। सद्गुरु भगवान की शरण सानिध्य में उनकी सेवा “परिचर्यात्मकं” उनके निर्देशन में चलते – चलते वही शूद्र श्रेणी का साधक प्रमोट करके ब्राम्हण बन जाता है। अब प्रश्न उठता है कि ब्रह्म कौन है? क्या चार मुख आठ आंखों वाला देवता ?नहीं। जिसने प्रजा के मूल उद्गम परमात्मा में प्रवेश पा लिया वह महापुरुष ही ब्रह्म है। उसकी बुद्धि ही ब्रह्म है। “*अहंकार सिव बुद्धि अज, मन ससि चित्त महान*” उस समय ऐसे ब्राम्हण अवस्था के साधक की बुद्धि यन्त्र मात्र होती है। उस साधक की वाणी में परमात्मा ही बोलता है। उसी को ब्रह्म वाक्य कहते हैं। ऐसे साधक की बुद्धि ब्रह्म से संयुक्त हो जाती है तो वह जो बोलते हैं कहते हैं आदेशित करते हैं उनके माध्यम से परमात्मा बोलते हैं यही है ब्राह्मण का मुख से पैदा होना। ऋग्वेद के अनुसार यही है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की योग -साधना के आधार पर क्रमोन्नत सोपान की यौगिक शब्दावली। जिसे संसार नकल करके इन पदवियों से विभूषित हो कर समाज में लात घूसा खाता रहता है। नकल किये आशाराम बापू राम-रहीम संत ज्ञानेश्वर , मिर्ची बाबा आदि कथावाचक जो जेल में बंद हैं। आजकल एक कथा वाचक की चोटी काट ली गयी। उस पर आरोप था कि वह ब्राह्मण नहीं था। तो क्या चोटी काटने वाले ब्राह्मण थे? नहीं। क्या ब्राह्मण की कोई चोटी काट सकता है या अपमानित कर सकता है? नहीं। वह सर्वत्र पूजनीय होते है। भगवान उनकी रक्षा में उनके आगे- पीछे खड़े रहते हैं। रैदास, माता मीरा, काया के बीर कबीर , गुरु नानक आदि महापुरुषों को समाज अपमानित करने की कोशिश किया लेकिन वह खुद अपमानित हो गया। समाज में जो भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे पवित्र यौगिक शब्दावली को ओढ़ कर अपने आप को श्रेष्ठ घोषित किया वह हजार बार अपमानित हुआ है। विदेशी आक्रांताओं के अधीनस्थ हजारों साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े ये तथाकथित श्रेष्ठ ब्राह्मण क्षत्रिय पग- पग अपमानित होते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर से ये तथाकथित ब्राह्मण निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। 2014 से आरएसएस एलायंस भाजपा की सरकार है लेकिन अभी तक इनका निर्वासन खत्म नहीं हुआ। तो कहने का अर्थ है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र योग आधारित भजन आधारित योग्यता का नाम है न कि जन्मजात शब्दावली। गांव में पास पड़ोस में देखा जाता है कि किसी का नाम विधायक हो जाता है सांसद हो जाता है प्रधान हो जाता है मंत्री हो जाता है लेकिन क्या वे संसद विधानसभा या ब्लाक में बैठ पाते हैं? क्या नाम धर लेने से उन्हें सरकार की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं? तो ठीक इसी तरह तत्समय के बुद्धिजीवी वर्ग अपने आप को इन यौगिक शब्दावली को ओढ़े और अपमानित हुए और अभी भी हो रहे हैं और भविष्य में भी होते रहेंगे। धर्म को धंधा बनाने वाले धर्म के सियासी ठेकेदारों का हश्र एक न एक दिन होना ही है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज अपने उद्बोधन में बार- बार कहते हैं कि विश्व को धर्म- शास्त्र देने वाला भारत आज खुद धर्म- शास्त्र के अभाव में भटका हुआ है। पूजते – पूजते तैंतीस करोड़ देवता भी कम पड़ जा रहे हैं तो सैय्यद जिन्नाद मजार को पूज रहे है। यही भटकाव ही विघटन का कारण है। उन्होंने बताया कि “गीता” आदि धर्म- शास्त्र है जिसका यथावत भाष्य “यथार्थ गीता” है जिसमें एक ईश्वर की अराधना का विधान है, जिसके मार्गदर्शन में चलकर धर्म- संबंधित सारी भ्रांतियों का शमन हो जाता है और ईश्वरीय आलोक का दिग्दर्शन होने लगता है। शूद्र से ब्राम्हण शिव स्वरूप बनना है तो यथार्थ गीता पढ़ें। यथार्थ गीता पूरे संसार को पवित्र करने, छुआ-छूत से मुक्त करने, श्रेष्ठ ब्राह्मण शिव स्वरूप में तब्दील करने का खुला आमंत्रण देती है। आओ हम सब मिलकर यथार्थ गीता में रचे-बसे, एक मंच पर आएं, सबको गले लगाएं ,भगवान को भा जाएं। यथार्थ गीता के आलोक से पूरे विश्व को आलोकित करने वाले पूज्य श्री गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।






