संपादकीय द्वारा वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक बांकेलाल निषाद “प्रणव”
कुर्बानी हज़रत इब्राहिम की तरह अपने आपको कुर्बान करने का नाम है।
कुर्बानी अर्थात बलिदान बड़ा ही कठिन परीक्षा है ईश्वरीय पथ में अपने को मिटना और अपनों को मिटाना पड़ता है। अल्लाह का मार्ग बड़ा कठिन दुरुह और कंटकीय होता है । कोई विरला ही उस दुरुह मार्ग पर चल कर अल्लाह का दीदार करता है । दीदीर के पहले उसे अनगिनत कठिन परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ता है। ऐसी परीक्षा देने वाले महापुरुषों से इतिहास अपने स्वर्णिम पन्नों पर नाज कर रहा है। अल्लाह की इबादत में सुकरात और माता मीरा को जहर पीना पड़ा। शम्स तबरेज की खाल उधेड़ ली गयी। ईसा को सूली मिला। महात्मा मंसूर पर पत्थर फेंके गए। महात्मा मोरध्वज को सपत्नीक अपने इकलौते पुत्र पर आरा चलाना पड़ा। ठीक इसी तरह कठिन परीक्षाओं के दौर से हज़रत इब्राहिम को भी गुजरना पड़ा। 
कुर्बानी से खुदा की राह में हर चीज कुर्बान करने का जज्बा रखना चाहिए। एक बार हजरत इब्राहिम को स्वप्न हुआ कि वे अल्लाह के आदेश पर अपनी सबसे प्रिय चीज को कुर्बान करें। हजरत अपने इकलौते बेटे को कुर्बानी देने को तैयार हो गये लेकिन खुदा ने उन्हें एक जानवर दुम्बा दे दिया। भगवान को प्राप्ति में बुद्ध पूरनमल गोपीचंद महावीर स्वामी आदि महापुरुषों ने अपना राजपाट कुर्बान कर दिया। माता मीरा अपनी राजशाही शान-शौकत कुर्बान कर दिया। भक्त शिरोमणि मोरध्वज सपत्नीक अपने बेटे पर आरा चलाया। भगवान अपनी स्थिति प्रदान करने के पहले बड़ी ही कठिन परीक्षा लेते हैं। अनगिनत परीक्षाओं की आग से होकर गुजरना पड़ता है। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान ने बताया कि ऐसे ही कठिन परीक्षा के दौर से हज़रत इब्राहिम भी गुजरे । एक बार उन्हें स्वप्न हुआ कि तुम अपनी कोई प्रिय चीज हमें दान कर दो। हज़रत इब्राहिम को परमात्मा का वरदहस्त प्राप्त था उनके पनाहगार में यंत्रवत चलते थे फिर उन्होंने अल्लाह के फरमान को कबूलते हुए अपने सबसे प्रिय इकलौते पुत्र इस्माईल को कुर्बानी देने के लिए आगे बढ़े। परीक्षा की कठिन घड़ी में बेटे को नहला धुला कर नये कपड़े पहना कर मीना के मैदान में कुर्बानी देने के लिए ले गए और कुर्बानगाह में लेटा दिया और जैसे ही छूरी चलाना चाहा तो बेटे इस्माईल ने कहा कि अब्बू जान छूरी चलाने से पहले आंखों में पट्टी बांध लें ताकि छूरी चलाते समय हाथ न कांपे। आंखों में पट्टी बांधने के बाद छूरी चलायी तो छूरी नहीं चली दोबारा प्रयास किया तो छूरी चली कुर्बानी भी हो गयी तो आंख की पट्टी खोलकर देखा तो बेटे इस्माईल की जगह हजरते जिब्रील द्वारा दुम्बा लेटा मिला।
इस्माईल बच गये कुर्बानी भी कबूल हो गयी हज़रत इब्राहीम परीक्षा में पास हो गये तभी से ईद उल अजहा के दिन मुसलमानों पर कुर्बानी फर्ज हो गयी। विष्णु भक्त राजा मोरध्वज की परीक्षा हज़रत इब्राहिम से भी ज्यादा कठिन हुई। महाभारत युद्ध के बाद अर्जुन को अहंकार हो गया कि मुझसे बड़ा भक्त भगवान श्रीकृष्ण का इस संसार में कोई नहीं है। अंतर्यामी श्रीकृष्ण अर्जुन के हृदय की बात जान गये और अर्जुन को अपने साथ लेकर ब्राम्हण वेशभूषा में जंगल में एक शेर पकड़ा और भक्त मोरध्वज के दरवाजे पर दस्तक दे दिये। राजा मोरध्वज श्रीकृष्ण से आतिथ्य स्वीकार के लिए अनुनय-विनय किये; भगवान श्रीकृष्ण इस शर्त पर आतिथ्य स्वीकार किए कि राजा अपने पत्नी के साथ मिलकर अपने तीन वर्ष के बेटे रतन कंवर को आरे से काटकर उसके मांस को पकाकर हमारे शेर को खिलायेगा तभी हम आतिथ्य को स्वीकार करेंगे। इतना ही नहीं जब राजा और रानी अपने बेटे पर आरा चलायें तो तो आंसू नहीं गिरने चाहिए नहीं तो हमारा शेर उस पके मांस को नहीं खायेगा। राजा और रानी दोनों ने ऐसी ही कठोर शर्तों का पालन करते हुए बेटे रतन कंवर को आरे से चीरकर और मांस को पकाकर भगवान श्रीकृष्ण के शेर को परोसा। भगवान राजा मोरध्वज सपत्नीक व उनके बेटे के समर्पण को देख अति प्रसन्न हुए और रतन कंवर को जिंदा कर दिये और वर मांगने को कहा। राजा मोरध्वज सपत्नीक भगवान से यही वर मांगे कि इतनी कठिन परीक्षा अब और किसी भक्त का न लें। हज़रत इब्राहिम और विष्णु भक्त राजा मोरध्वज की ये रही उदाहरण उनकी भक्ति की कठिन परीक्षा जिसको उन्होंने पास किया और भगवान को भा गये। इतिहास उन्हें आज भी याद करता है। अब दो उदाहरण और देखें। पूज्य श्री गुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के गुरु महाराज की जन्मस्थली रामकोला में एक नत्थू खां नाम का कसाई मर गया। जो बकरों को काटकर उसका मांस बेचा करता था। मरने के बाद भी उसकी एक अंगुली हिल रही थी। एक घंटे बाद वह उठ बैठा। उठते ही उसने कहा कि देखो गांव का नत्थू हरिजन मरा कि नहीं ? तो किसी ने बताया कि अभी – अभी मरा है उसके घर की औरतें विलाप कर रही हैं। लोगों ने पूछा कि कि नत्थू चमार के बारे में आपने क्यों पूछा? तो उसने बताया कि
उसके चारो ओर अंधेरा होने लगा कुछ क्रूर आकृतियां उसे कहीं ले जाने लगी। मार्ग में वे बकरे बकरियां जिन्हें उसने काटा था उसे खाने के लिए जीभ लपलपाते हुए दौड़ी । ले जा रहे लोगों ने कहा कि तुम सबको को मौक दिया जाएगा पहले इसकी पेशी होने दो वे उसे एक भीमकाय व्यक्ति के दरबार में ले गये उसने देखते ही कहा कि इसे क्यों ले आये बही देखो इसकी आयु अभी शेष है। बही देखी गई जिसे ले आना था वह नत्थू खां नही नत्थू हरिजन है। इस घटना के बाद नत्थू खां कसाई वाला काम छोड़ दिया और शाकाहारी हो गया। दूसरा उदाहरण संत सदन कसाई का मिलता है । उनका एक बाट था ठाकुर जी का। ठाकुर जी की उसी एक बाट से मांस को तौलते थे चाहे किसी ग्राहक को पांच किलो चाहिए चाहे दो किलो या एक पाव। ईश्वरीय प्रेरणा से एक रात्रि उनके घर कुछ मेहमान आ गये। आतिथ्य सेवा में उनके पास मांस का एक भी टुकड़ा बचा नहीं था। अगले दिन काटने के लिए उनके पास एक भैंसा बंधा हुआ था। उन्होंने सोचा कि क्यूं न भैंसे के अंडकोष को काटकर आतिथ्य सेवा में भोजन करा दिया जाए फिर अगले दिन भैंसे को काटकर बेच दिया जाएगा। जैसे ही सदल कसाई भैंसे का अंडकोष काटने के लिए कटार लेकर गये तो भैंसा बोल पड़ा कि हमने आपका गर्दन काटा था अंडकोष नहीं बदला ही लेना है तो गर्दन काटिए। सदन कसाई भैंसे से पूछ पड़े कि बात क्या है? तो उसने उत्तर दिया कि पिछले जन्म में आप संत थे भिक्षाटन के लिए मेरे गांव में आप एक घर पर पधारे। उस घर में एक दूल्हन ही थी बाकी कोई नहीं था आपने उस नई – नवेली दुल्हन से भिक्षा मांगा उसने आपके तेजोमय मुखमंडल को देख आप पर मोहित हो गयी और अपने साथ संसर्ग स्थापित करने के लिए आप पर दबाव डालने लगी। लेकिन आप लंगोटी के पक्के थे उच्च कोटि के संत थे आपने ऐसा करने से मना कर दिया उसने आपको झूठे इल्जाम में फंसाने की धमकी दी लेकिन आप तब भी नहीं माने और परमात्मा का उलाहना देते हुए उसे आपने समझाने का प्रयास किया। अंततः उसने हल्ला गोहार मचाया कि आप उसके अस्मत को लूट रहे हैं तभी गांव के लोग आये आपको मारने लगे आपको मारते-पीटते सैकड़ों लोगों ने बेहोश कर दिया। मैं बहुत बाद में फावड़ा लेकर पहुंचा और आपके गर्दन पर फावड़े से जोरदार वार किया और आपका धड़ सर से अलग कर दिया। जितने लोग आपको मारे — पीटे थे सबको आप काट कर बेच चुके हैं केवल मैं बचा हूं और मैंने आपका गर्दन काटा था इसलिए आप मेरा गर्दन काट कर बदले पूरा करें। सदन कसाई जब भैंसे के मुखारविंद से अपने पिछले जन्मों के जीवन वृतांत की कहानी सुने तो उनके हाथ से कटार छूट गया और वे भैंसे को सकुशल मुक्त कर दिये उसे प्रणाम किये फिर वे भजन में लग गये। लोग बताते हैं कि सदन कसाई महात्मा सदन हो गये और उनके अंतिम समय में उन्हें लेने के लिए स्वर्ग से विमान आया था। तो कहने का अर्थ है कि दो उदाहरण हज़रत इब्राहिम और राजा मोरध्वज परमात्म पथ के पथिक थे जिन्हें उस पथ का मार्ग प्रशस्त करने के लिए कठिन परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ा ऐसी परीक्षाओं के दौर से बहुतों को गुजरना पड़ा है। लेकिन अब जरा गौर करें नत्थू खां और सदल कसाई का उदाहरण हमें क्या सिखाता है ? यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि सृष्टि के समस्त जीवों का लेखा-जोखा परमात्मा के पास है। युगों पश्चात भी वह उसे ज्यों का त्यों प्रसारित करता है । यह जीव जिस तरह समझ सकता है, भगवान उसे, उसी संबोधन उसी वातावरण के विवरण देकर विधिवत समझातें हैं। अब जरा गौर करें हजरत इब्राहीम शम्स तबरेज, संत रबिया, ईसा ,मूसा माता मदालसा, महात्मा मंसूर आदि महापुरुषों को “अनलहक” (अहं ब्रम्हास्मि) की अवस्था क्या बकरीद मनाने से मिली थी? नहीं। अपने- अपने ईष्ट के समक्ष कोई बकरे की बलि देता है तो कोई भैंसे की कोई सुअर की तो कोई – कोई मानव की बलि देता है। ये भटकाव है परमात्मा से मिलन की दूरी को और बढ़ा देता है। परमात्मा घट – घट में रहता है सबके हृदय में भगवान प्रसारित हैं एक भी हृदय उनसे खाली नहीं है इसलिए उस घट पर अपने आपको बलिदान कर दो न कि किसी जीव की बली दो।
सब घट मेरा साइयां, सूनी सेज न कोय सूनी सेज न कोय।
बलिहारी घट तासु की, जा घट परगट होय।।






