अम्बेडकर नगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
कटाक्ष : हे डीएम साहब थियेटरवा/ वेरायटी शोउवा काहें बंद है।
“प्रयागराज में आईआईटी बाबा मिले।, बिहार में मिले अनंत।।*” *गोविन्द साहब में डीएम मिले।
मेला होइ गया चौपट्ट*।।”
पूर्वांचल का सुप्रसिद्ध सवा महीने चलने वाला मेला अबकी बार वेरायटी शो और थियेटर के विरह- वियोग में आहें भर रहा है। आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है; कारण कि आंसू रोकने वाले इंजेक्शन का परमीशन डीएम अनुपम शुक्ला नहीं दे रहे हैं। “अश्लीलता के बहाने गर्दिश में सितारे” डीएम साहब को मंजूर है लेकिन नो वेरायटी शो, नो थियेटर , नो परमीशन जारी रहेगा। नो परमीशन की वजह से आज तक वर्षों पूर्व में परमीशन देने वाले जिलाधिकारियों की लंबी फेहरिस्त घुटने टेक चुका हैं। मेला उदास, मेलार्थी उदास, दुकानदार उदास , क्षेत्र उदास, मेला प्रांगण उदास , गलियां उदास हर तरफ उदासी की छत्रछाया है । जहां जिस गली में भीड़ के धक्कों से कंधा बोल जाता था, भीड़ को कंट्रोल करते – करते पुलिसकर्मियों के पसीने छूटने लगते थे वहीं आज हर गलियों में चार पुलिसकर्मी आपस में बात करते हुए और मूंगफली खा कर समय काटते हुए दिखते हैं। विविधता का नाम ही मेला है, मेल का नाम ही मेला है बारहों व्यंजन भोजन बना हो यदि नमक नहीं है तो सब बेकार है । ऐसे ही वेरायटी शो और थियेटर मेले में परंपरागत नमक जैसे ही है। इसलिए मेलार्थी बिना नमक के मेले रुपी भोजन का आनंद नहीं ले पा रहे हैं। लेकिन डीएम साहब कह रहे हैं कि नमक मना है इससे वीपी हाई हो जाती है; नमक के बजाय दूध रोटी खाइये। इससे कई फायदा है जैसे नमक मना रहेगा तो चिखना नहीं ढूंढेंगे, नहीं तो चिखना के बाद सीसी ढूंढेंगे, सीसी आपको मेला कोतवाली पहुंचा देगी फिर हमारे एसपी साहब परेशान होंगे। इसलिए डीएम साहब “सादा जीवन उच्च विचार” के पक्षधर हैं नो वेरायटी शो, नो थियेटर, नो परमीशन। फिलहाल हमारे डीएम साहब पहले डीएम है जिनकी चर्चा परमीशन को लेकर कई जिलों में है और उनकी यह चर्चा इस कहावत को चरितार्थ कर रही है कि “मर्दे कै चर्चा और खर्चा बंद नहीं होना चाहिए”।






