धारकुंडी ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
श्री- श्री १००८ श्री स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज हुए ब्रम्हलीन

भगवान अत्रि और माता अनुसुइया की तपोस्थली जहां भगवान राम अपने वनवास काल को कुछ दिन बिताए उसी तपोभूमि की शोभा बढ़ाने वाले 21 वीं सदी के युग महापुरुष युग प्रवर्तक परमहंस स्वामी परमानंद जी महाराज के प्रथम स्वरुपस्थ शिष्य व विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म-शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज के गुरु भाई श्री- श्री 1008 श्री स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज ने आज 7 फरवरी 2026 को 102 वर्ष की अपनी स्थूल शरीर को बसुंधरा की गोंद में रखकर सूक्ष्म शरीर से अपने गुरुदेव भगवान की ही तरह विश्व के कण-कण में एकाकार हो गये। अद्भुत आलौकिक शक्ति से युक्त अनुसुइया के घनघोर जंगल में तपस्यारत उनके गुरुदेव भगवान को एक बार अनुभव में आया कि नींबू कटकर बराबर हो गया तो उन्होंने अपने शिष्य पूज्य श्री स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज से कहा कि तुममें और मुझमें कोई अंतर नहीं है तुम मेरे बराबर हो गये हो अब जाओ धारकुंडी रहो, उनके आदेश को श्रवण कर उन्होंने अनुनय-विनय किया कि भगवन मैं धारकुंडी आपकी ही कृपा से रहूंगा। अपने गुरुदेव भगवान के आदेश को भरत जी खड़ाऊं की तरह शिरोधार्य कर 22 नवम्बर 1956 को धारकुंडी मध्यप्रदेश के तपोस्थली में आकर भजन करने लगे। भजन के दौरान ही दिव्य आकाश से अकस्मात दिव्य आलौकिक विभूतियों का प्रचंड प्रकाश पुंज का अवतरण उनके हृदय में हुआ। उसी दिन से उनके चरणों से संसार को मुक्त कराने वाली कल्याण की गंगा बह निकली जिसमें गोता लगाकर संसार अपने आप को कृतार्थ कर रहा है। जा मरने से जग डरा सो मेरो आनंद।
कब मिरिहौं कब पाइहों पूरन परमानंद।।
योगेश्वर श्री श्री 1008 श्री परमहंस स्वामी श्री सच्चिदानंद जी महाराज और उनके गुरु भाईयों में जैसे अवधूत श्री भगवानानंद जी महाराज और परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज में अद्भुत अद्वितीय मर्यादा और सम्मान था । तीनों अरिहंत महापुरुषों के बीच वाणी संयम, रहन-सहन खान-पान और अलौकिक जीवन-शैली सब में अनुकरणीय मर्यादा रही। आज दोनों महापुरुषों ने अपनी- अपनी संसार को कल्याण करने वाली जिम्मेदारियां अपने तीसरे गुरु भाई परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज को सौंपकर ब्रम्हांड में एकाकार होकर ब्रम्हलीन हो गये। महान तपोस्थली धारकुंडी का हर शिला, हर वृक्ष, हर श्वासें, हर आबो-हवा उनके रजकणों का और उनकी उपस्थिति का साक्षी रहेगा। संसार को प्रदत्त उनके अप्रतिम आध्यात्मिक योगदान के लिए पूज्य श्री के चरणों में कोटि-कोटि नमन।






