अम्बेडकर नगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद “प्रणव”
विवाहोत्सव पूर्व यथार्थ गीता पाठ व भंडारे का आयोजन
विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित कालजयी धर्म-शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता समय के तत्व द्रष्टा महापुरुष अनंत विभूषित ब्रह्मऋषि करुणा निधान परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज की कृपा व आशीर्वाद से बंदीपुर ब्लाक अंतर्गत स्थित भिटौरा निवासी सुबाष सिंह के घर विवाहोत्सव पूर्व यथार्थ गीता पाठ व भंडारे का आयोजन किया गया। भारतीय वेद- वेदांग में वर्णित सोलह संस्कारों में विवाह संस्कार की विशेष महत्ता है। विवाह संस्कार संपन्न होने के बाद वर-वधु गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते हैं । जिसके माध्यम से हम सांसारिक विवाह से आध्यात्मिक विवाह में प्रवेश करते हैं । आत्मा का परमात्मा से मिलन अथवा योग के लिए हमें सद्गुरु की शरण अपरिहार्य है। सद्गुरु एक ऐसा खेवनहार है जो प्रकृति के झंझावत से पार करता है और जन्म- जन्मांतर के संस्कारों को भष्मसात करता है। सांसारिक पति संकल्प के अनुसार वधु की रक्षा नहीं कर पाता द्रोपदी इसका
उदाहरण है । उसके पांचों महाबली पतियों के समक्ष उसका चीरहरण हुआ और उसकी अस्मत कोई नहीं बचा पाया शिवाय सद्गुरु रूपी पति भगवान श्रीकृष्ण के। पति परमेश्वर सद्गुरु का नाम है जो साधक रुपी वधू का पत अर्थात मान-सम्मान इज्जत प्रतिष्ठा की रक्षा अहर्निश करते रहते हैं। चूंकि सद्गुरु सर्वत्र विश्व के अणु अणु में विद्यमान रहते हैं जहां भी उनका भक्त सुख अथवा दुख में उन्हें याद किया वहीं से वे उस भक्त की रक्षा कर देते हैं। सद्गुरु को ही उनकी अनंत विभूतियों के अनुसार भगवान परमात्मा ब्रम्हा, विभू आदि नामों से जाना जाता है *सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोअ्क्षिशिरोमुखम।*
*सर्वत: श्रृतिमल्लोके सर्वमावृत्य।।* इसलिए वह ब्रम्ह सब ओर से हाथ पैर वाला, सब ओर से नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला — सुनने वाला है; क्यों कि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
इसीलिए सद्गुरु एक रहनी का नाम है। वह साधक के योगक्षेम के वहन का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। वे एक जगह बैठे-बैठे सर्वत्र कार्य करते हैं। वे अनंत हाथ-पैर वाला होते हैं। सांसारिक वर वधू सात जन्म तक साथ रहने को संकल्पित होते हैं जबकि सद्गुरु रूपी वर व साधक रूपी वधू परमात्म पर्यंत तक की दूरी तय करने तक साथ रहते हैं चाहे कागभुशुण्डि भगवान की तरह हजारों जन्म ही क्यों न लग जाए। 
वर का मतलब ही वरण होता है सद्गुरु जब वरण कर लिये तो फिर लीक का लाक होने में समय नहीं लगता। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती इतिहास प्रसिद्ध है, अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण की दोस्ती, केवट और भगवान राम की दोस्ती तमाम ऐसे उदाहरण से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।






