मिर्जापुर ब्यूरो बांकेलाल निषाद ‘प्रणव”
सद्गुरु कृपा बरसने से शत्रु मित्र हो जाते हैं, विपत्ति संपत्ति बन जाती है— स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज
गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पाय।* *बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए।।
जो इच्छा करिहों मन माहीं। हरि प्रसाद कुछ दुर्लभ नाहीं।।
जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करे सब कोई
गरल सुधा रिपु करिय मिताई! गो पद सिंधु अनल सितलाई!!
गरुण सुमेरु रेनु सम ताही! राम कृपा कर चितवा जाही!!
कालजयी,पालनहार खेवनहार निर्विकार शास्वत स्वरूप की लक्ष्य विदित करा देने वाली सत्ता सद्गुरु होता है यह बात अनन्त विभूषित परमहंस श्री स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने कही। उन्होंने अपने उद्बोधन से पवित्र पावनी ज्ञान गंगा की अमृत वर्षा करते हुए कहा कि ओम जप और सद्गुरु ध्यान करने से दुर्लभतम उपलब्धि की प्राप्ति हो जाती है। भगवान जब कृपा करते हैं तो शत्रु मित्र हो जाता है और विपत्ति संपत्ति बन जाती है। उन्होंने कहा कि संसार को ओम् शिव अथवा राम का जप करना चाहिए। ओ अर्थात वह अविनाशी परमात्मा अहं आप स्वयं अर्थात भगवान का सबके ह्रदय में वास है इसलिए भगवान का एक नाम ओम है, राम अर्थात भगवान घट घट में रमण करता है वास करता है *रमन्ते योगी यस्मिन स: राम:* इसलिए भगवान का एक नाम राम है, शिव अर्थात प्रकृति की सीमाओं से अतीत असीम सत्ता का नाम ही शिव है अर्थात चाहे ओम् राम अथवा शिव जो भी जपेंगे भगवान को पता चल जायेगा मेरा भक्त मुझे पुकार रहा है। पूज्य गुरुदेव भगवान ने जोर देकर कहा कि भगवान जब पुकार सुनेगा तो जो चाहोगे सब भगवान देंगे तुम्हें किसी भी एंगिल से निराश नहीं होना पड़ेगा। *जो इच्छा करिहों मन माहीं। हरि प्रसाद कुछ दुर्लभ नाहीं ।।*
सद्गुरु वह आटो चाभी है जिससे संसार के जटिलतम ताले को खोला जाता है सद्गुरु वह खेवनहार है जिससे बड़े से बड़े संसारी समुद्र को पार किया जाता है सद्गुरु वह योगाग्नि है जिससे जन्म जन्मांतर के संस्कारों को भस्मासात किया जाता है और सद्गुरु वह सत्ता है जिस पर यंत्रवत चलने से कभी पराजय का मुख नहीं देखना पड़ता है हमेशा साधक अजेय अभय की अवस्था में निर्भीक होकर निरंतर परमात्मपथ की दूरी तय कर लेता है।






